हमारे मोहल्ले में एक अनोखी शख्सियत रहते थे—चाचा त्रिलोकीनाथ। उनकी सबसे बड़ी प्रतिभा थी हर काम में टांग अड़ाना। चाहे मामला घर का हो, गली का हो या देश-दुनिया का, चाचा जी की राय बिना बुलाए हाज़िर हो जाती थी। लोग कहते थे कि अगर किसी काम में रुकावट न आ रही हो, तो चाचा जी को बुला लो, वे व्यवस्था कर देंगे।
एक बार शर्मा जी ने अपने घर की पेंटिंग शुरू करवाई। रंग अभी आधा ही हुआ था कि चाचा जी प्रकट हो गए। दीवार को ध्यान से देखते हुए बोले, “यह नीला ठीक नहीं है, इसमें हल्का तोता-हरा मिलाओ, घर चमक उठेगा।” बेचारे शर्मा जी दुविधा में पड़ गए। पेंटर ने रंग बदला, लेकिन नतीजा ऐसा निकला कि घर तोता कम और तोता-चश्म ज्यादा लगने लगा।
कुछ दिनों बाद गुप्ता जी ने नई स्कूटर खरीदी। चाचा जी ने तुरंत सलाह दी, “पहले दिन लंबी दूरी मत चलाना, इंजन थक जाएगा।” गुप्ता जी ने उनकी बात मान ली। हफ्ते भर स्कूटर खड़ी रही और बैटरी बैठ गई। तब चाचा जी ने गंभीर स्वर में कहा, “देखा, मैंने कहा था न, मशीन को समझना चाहिए।”
चाचा जी की आदत इतनी प्रसिद्ध थी कि मोहल्ले के बच्चे भी खेल शुरू करने से पहले चौकीदारी रखते—“देखो, चाचा जी आ तो नहीं रहे?” एक दिन क्रिकेट मैच चल रहा था। जैसे ही बल्लेबाज़ ने छक्का मारा, चाचा जी बोले, “अरे, पैर आगे रखो, टेक्निक गलत है।” अगली गेंद पर खिलाड़ी बोल्ड हो गया। चाचा जी ने संतोष से सिर हिलाया, मानो उनकी भविष्यवाणी सच हो गई हो।
सबसे मज़ेदार घटना तब हुई जब चाचा जी खुद घर की छत ठीक करवा रहे थे। पड़ोसी ने मज़ाक में कहा, “चाचा जी, किसी की टांग मत अड़ाने देना।” चाचा जी मुस्कुरा दिए, लेकिन उसी समय उनका पैर सचमुच फिसल गया और वे बाल-बाल बचे।
उस दिन के बाद थोड़ी सावधानी आई, पर आदत पूरी तरह नहीं गई। अब भी वे हर चर्चा में मौजूद रहते हैं। फर्क बस इतना है कि लोग मुस्कुराकर कहते हैं—“चाचा जी, आपकी टांग सुरक्षित दूरी से अड़ाइए।”