नेता जी का नाम पूरे इलाके में बड़े सम्मान से लिया जाता था, कम से कम मंच पर तो लोग तालियाँ बजाकर ऐसा ही दिखाते थे। नेता जी का सबसे बड़ा हुनर था – हर सवाल का गोलमोल जवाब देना। मोहल्ले वाले कहते थे कि अगर नेता जी सीधे जवाब देने लगें तो मौसम भी हैरान हो जाएगा।
एक दिन मोहल्ले में पानी की समस्या को लेकर सभा रखी गई। लोग परेशान थे, इसलिए सबने नेता जी को बुला लिया। नेता जी मंच पर खड़े हुए, गले में फूलों की माला और चेहरे पर गंभीर भाव।
उन्होंने भाषण शुरू किया, “मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, पानी जीवन है और जीवन पानी है।” यह सुनकर पीछे खड़े कुछ बच्चे आपस में हँसने लगे।
फिर एक बुजुर्ग ने पूछा, “नेता जी, हमारे मोहल्ले में पानी कब आएगा?” सवाल सुनकर नेता जी मुस्कुराए और बोले, “देखिए, पानी आना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। जैसे सूरज उगता है, वैसे ही पानी भी आएगा।”
बुजुर्ग बोले, “लेकिन सूरज तो रोज उगता है, पानी तो हफ्ते में एक बार भी नहीं आता।”
यह सुनकर नेता जी थोड़े असहज हो गए और बगलें झाँकने लगे। उन्होंने कहा, “सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही है।”
तभी एक महिला बोलीं, “गंभीरता से विचार पिछले चुनाव से चल रहा है, पर नल में पानी अभी तक नहीं आया।”
भीड़ में हल्की हँसी फैल गई। नेता जी समझ गए कि आज मामला थोड़ा टेढ़ा है।
उन्होंने बात बदलते हुए कहा, “हम सड़क, पानी और बिजली तीनों पर काम करेंगे।”
एक नौजवान ने पूछा, “तीनों कब तक?” नेता जी बोले, “समय आने पर।”
नौजवान बोला, “समय तो पिछले पाँच साल से आ रहा है।”
अब नेता जी सच में घबरा गए और इधर-उधर देखने लगे, जैसे मंच के नीचे कोई रास्ता ढूँढ रहे हों।
अचानक उनके सहयोगी ने कान में कहा, “भाषण खत्म कर दीजिए।” नेता जी बोले, “आप लोगों का प्यार देखकर मैं अभिभूत हूँ।” और जल्दी से मंच से उतर गए।
उस दिन नेता जी ने घर जाकर सोचा कि कभी-कभी सवालों के सामने भाषण भी बगलें झांकने लगता है।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि नेता जी फिर आएंगे, लेकिन अब सवाल पूछने वालों की संख्या देखकर ही।