मोहल्ले में रमेश जी की नई पड़ोसन आई थी। नाम था सुमित्रा देवी, लेकिन मोहल्ले वाले उन्हें प्यार से “टेढ़ी खीर” कहने लगे थे क्योंकि उनका हर जवाब थोड़ा उल्टा और रहस्यमय होता था। रमेश जी स्वभाव से जिज्ञासु थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि पड़ोसन से दोस्ती करनी चाहिए।
एक दिन सुबह-सुबह रमेश जी हाथ में दूध का गिलास लेकर सुमित्रा जी के घर पहुँचे। मुस्कुराते हुए बोले, “बहन जी, नया पड़ोसी हूँ, सोचा परिचय कर लूँ।” सुमित्रा जी ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, “परिचय तो हो जाएगा, पहले बताइए दूध उधार लेने आए हैं या दोस्ती करने?”
रमेश जी घबरा गए और बोले, “न… नहीं, सिर्फ हालचाल पूछने आया था।” सुमित्रा जी बोलीं, “अच्छा, हालचाल पूछना भी एक कला है।”
दूसरे दिन रमेश जी ने सोचा कि कुछ मिठाई ले जाकर दोस्ती मजबूत कर ली जाए। वे खीर का कटोरा लेकर पहुँचे। दरवाजा खुलते ही बोले, “मैं पड़ोसी धर्म निभा रहा हूँ।” सुमित्रा जी ने खीर देखकर कहा, “खीर अच्छी है, लेकिन मीठा कम है या आप खुद कम मीठे हैं?”
यह सुनकर रमेश जी की हँसी गायब हो गई। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी।
तीसरे दिन रमेश जी ने पूछा, “आपको मोहल्ला कैसा लगा?” सुमित्रा जी बोलीं, “मोहल्ला अच्छा है, बस कुछ लोग ज्यादा जिज्ञासु हैं।” रमेश जी समझ गए कि इशारा उन्हीं की तरफ है।
एक शाम रमेश जी ने सोचा कि अब साफ बात कर ली जाए। बोले, “मैं आपसे दोस्ती करना चाहता हूँ।” सुमित्रा जी मुस्कुराईं और बोलीं, “दोस्ती करनी है तो पहले मेरी शर्तें सुनिए। ज्यादा सवाल नहीं पूछेंगे, बिना पूछे खीर नहीं भेजेंगे और मेरी चाय में नमक नहीं मिलाएंगे।”
रमेश जी चौंक गए, “चाय में नमक कौन डालता है?” सुमित्रा जी बोलीं, “आप जैसे जिज्ञासु लोग कभी भी डाल सकते हैं।”
धीरे-धीरे रमेश जी समझ गए कि सुमित्रा जी टेढ़ी जरूर हैं, लेकिन दिल की बुरी नहीं। कुछ दिनों बाद दोनों की दोस्ती हो गई, लेकिन रमेश जी ने एक नियम बना लिया—पड़ोसन से बात करनी है तो पहले दिमाग घर पर छोड़कर जाना है।
मोहल्ले वाले कहते हैं कि रमेश जी की जिंदगी में टेढ़ी खीर जरूर आई, लेकिन उसी ने जिंदगी का स्वाद भी मीठा कर दिया।