रवि को गणित की परीक्षा से हमेशा डर लगता था। जैसे ही परीक्षा का नाम सुनता, उसका पेट दर्द करने लगता और दिमाग में सवालों के पहाड़ उग आते। इस बार तो हालत और खराब थी क्योंकि उसने पूरे साल पढ़ाई को सिर्फ “कल से शुरू” करने की योजना पर रखा था।
परीक्षा वाले दिन रवि ने सुबह उठकर भगवान से प्रार्थना की, “हे भगवान, आज किसी तरह पास करा देना, मैं वादा करता हूँ अगले साल से सच में पढ़ूँगा।” माँ ने कहा, “झूठे वादे मत कर, पहले खाना खा ले।”
स्कूल पहुँचकर रवि की हालत ऐसी थी जैसे जान पर बन आई हो। परीक्षा हॉल में बैठते ही उसने इधर-उधर देखा। उसके दोस्त पहले से ही अपनी कॉपियाँ उलट-पुलट कर रहे थे जैसे कोई जादू की किताब ढूँढ रहे हों।
जैसे ही प्रश्नपत्र मिला, रवि की आँखें चौड़ी हो गईं। पहला सवाल था – “त्रिभुज के कोणों का योग सिद्ध करें।” रवि ने सोचा, “योग तो समझ में आता है, सिद्ध करना क्या होता है?” उसने बड़ी मेहनत से लिखा – “त्रिभुज के तीन कोण होते हैं और वे मिलकर दोस्ती का संदेश देते हैं।”
दूसरे सवाल में लिखा था – “वृत्त की परिधि का सूत्र लिखिए।” रवि ने सोचा और लिखा – “वृत्त गोल होता है और परिधि उसके आसपास घूमती है।”
तीसरे सवाल पर तो रवि की हालत खराब हो गई। उसने सोचा कि अगर कुछ नहीं आता तो ज्ञान की देवी को याद करना चाहिए। उसने कॉपी में लिखा – “मैं विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता हूँ कि मुझे यह प्रश्न समझ नहीं आया।”
पीछे बैठे दोस्त ने धीरे से कहा, “अरे! कुछ तो लिख दे, वरना फेल हो जाएगा।” रवि ने घबराकर लिखा – “गणित बहुत कठिन विषय है, लेकिन जीवन में धैर्य रखना जरूरी है।”
परीक्षा खत्म होने पर रवि बाहर निकला तो लगा जैसे पहाड़ जीत लिया हो। उसने दोस्तों से कहा, “आज तो जान बच गई।”
घर पहुँचकर रवि ने कॉपी के बारे में सोचा और मन ही मन बोला, “अगली बार सच में पढ़ाई करूँगा… शायद।” लेकिन अगले ही पल टीवी चालू कर दिया क्योंकि ज्ञान की देवी भी थोड़ी आराम चाहती थीं।