रमेश जी बड़े ही सुलझे हुए इंसान माने जाते थे, लेकिन उनकी पत्नी रमा जी का कहना था कि उनकी सबसे बड़ी समस्या उनकी “भूलने की बीमारी” थी। शादी की सालगिरह नजदीक थी और रमेश जी ने बड़े उत्साह से पत्नी को सरप्राइज देने की योजना बनाई। उन्होंने सोचा कि इस बार कुछ ऐसा करेंगे कि पत्नी खुश होकर गले ही पड़ जाए।
सालगिरह वाले दिन सुबह से ही रमेश जी अजीब सी हरकतें करने लगे। कभी अलमारी खोलकर बंद करते, कभी मोबाइल में नोट्स देखते और कभी खुद से ही बड़बड़ाते। रमा जी ने पूछा, “क्या कर रहे हो?” तो बोले, “प्रेम की तैयारी!” यह सुनकर रमा जी को शक तो हुआ, लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं।
शाम होते ही रमेश जी फूलों का बड़ा सा गुलदस्ता लेकर घर पहुँचे। मुस्कुराते हुए बोले, “प्रिये, आज तुम्हारे लिए खास उपहार है।” रमा जी खुश होकर बोलीं, “वाह, आज तो चमत्कार हो गया!” लेकिन जैसे ही उन्होंने डिब्बा खोला, अंदर से निकला… किचन का नया कड़छुल सेट।
रमा जी का चेहरा देखने लायक था। उन्होंने कहा, “यह क्या है?” रमेश जी बोले, “पिछली बार तुमने कहा था कि कड़छुल टूट गया है, इसलिए सोच समझकर उपहार लाया हूँ।” पत्नी ने गुस्से से देखा तो रमेश जी समझ गए कि मामला बिगड़ रहा है।
तभी उन्हें याद आया कि असली उपहार तो अभी बाकी है। उन्होंने जेब से छोटा सा डिब्बा निकाला। अंदर चॉकलेट और एक हाथ से लिखा कार्ड था – “मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी तुम हो।” रमा जी का गुस्सा थोड़ा कम हुआ, लेकिन फिर भी बोलीं, “पहले किचन का सामान देकर दिल दुखाया और अब मीठी बात!”
रमेश जी घबराकर पत्नी के सामने कान पकड़कर बैठ गए और बोले, “माफी चाहता हूँ, अगली सालगिरह पर कड़छुल नहीं, सिर्फ प्यार दूँगा।” यह सुनकर रमा जी हँस पड़ीं और बोलीं, “उठो, नाटक मत करो, खाना ठंडा हो रहा है।”
रात को रमेश जी बड़बड़ाते रहे, “प्यार जताना भी मुश्किल है और कड़छुल देना भी!” लेकिन मन ही मन खुश थे कि आज कान पकड़कर माफी माँगने का फार्मूला फिर काम आ गया।