गाँव में मोहनलाल नाम का एक कवि रहता था। वह असली कविता कम लिखता था और ख्याली पुलाव ज्यादा पकाता था। लोग उसे कहते थे, “मोहन कवि नहीं, सपनों का शहजादा है।”
मोहनलाल रोज सुबह चाय की दुकान पर बैठकर भविष्य की योजनाएँ बनाने लगता था। कभी कहता, “मैं दुनिया का सबसे बड़ा कवि बनूँगा।” कभी बोलता, “मेरी कविताएँ अखबार के पहले पन्ने पर छपेंगी।”
दुकानदार हँसकर कहता, “पहले चाय का हिसाब तो चुका दो।”
मोहनलाल को लिखने से ज्यादा सोचने का शौक था। वह कागज पर एक लाइन लिखता, फिर घंटों आसमान की तरफ देखकर दूसरी लाइन का इंतजार करता। उसकी डायरी में आधी कविता, दो सपने और तीन बड़े प्लान हमेशा रहते थे।
एक दिन उसने घोषणा कर दी, “मैं जल्द ही कविता संग्रह छपवाऊँगा।”
गाँव वाले बोले, “अच्छा, नाम क्या रखोगे?”
मोहनलाल ने तुरंत कहा, “ख्याली पुलाव और काव्य स्वाद।”
उसने अपने दिमाग में किताब का कवर भी डिजाइन कर लिया था। कवर पर खुद की फोटो, पीछे पहाड़, और ऊपर उड़ते हुए कबूतर।
लेकिन समस्या यह थी कि कविता लिखने के बजाय वह कविता के प्रचार की योजना ज्यादा बनाता था। वह सोचता, “अगर किताब नहीं बिकी तो मैं दूसरी किताब लिखूँगा, जिसमें पहली किताब की सफलता की कहानी होगी।”
एक दिन गाँव के स्कूल में कवि सम्मेलन हुआ। मोहनलाल को भी बुलाया गया। उसने माइक पकड़ा और कहा, “आज मैं ऐसी कविता सुनाऊँगा जो दिल को छू ले।”
भीड़ शांत हो गई। मोहनलाल ने दो मिनट तक आसमान देखा, फिर बोला, “मेरी कविता अभी मन के खेत में पक रही है, जैसे ख्याली पुलाव धीरे-धीरे बनता है।”
लोग हँसने लगे।
घर लौटकर उसकी पत्नी बोली, “तुम कविता कब लिखोगे?”
मोहनलाल मुस्कुराकर बोला, “अभी सपना पका रहा हूँ, कविता खुद बन जाएगी।”
और वह फिर ख्याली पुलाव की खुशबू में अपनी कविताओं का स्वाद खोजने लगा।