मार्च का महीना था और पूरे घर में अजीब सा तनाव तैर रहा था। वजह थी—राहुल की बोर्ड परीक्षा। राहुल सामान्य दिनों में बेहद शांत प्राणी था, लेकिन परीक्षा का नाम सुनते ही उसके सिर पर मानो भूत सवार हो जाता था।
सुबह पाँच बजे अलार्म बजता, तो वह ऐसे उछलकर उठता जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी के रिज़ल्ट पर निर्भर हो। माँ चाय देतीं तो वह पूछता, “माँ, अगर तीन चैप्टर छूट गए तो क्या मैं साधु बन जाऊँ?” पिताजी समझाते, “पहले परीक्षा दे लो, फिर सन्यास लेना।”
राहुल ने पढ़ाई का ऐसा टाइम-टेबल बनाया कि खुद देखकर घबरा गया। हर घंटे के लिए अलग विषय, हर विषय के लिए अलग रंग का पेन। दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा—“अब नहीं पढ़ा तो कभी नहीं!” लेकिन पाँच मिनट बाद ही मोबाइल की तरफ हाथ बढ़ जाता। फिर खुद को डाँटता, “यह मोह-माया है!”
परीक्षा से एक दिन पहले तो हालत और भी मज़ेदार थी। उसे लगने लगा कि जो पढ़ा है वह सब भूल गया है। उसने छोटी बहन से पूछा, “तुम्हें पायथागोरस का प्रमेय याद है?” बहन बोली, “मुझे तो मेरा होमवर्क भी याद नहीं।” राहुल का आत्मविश्वास और डगमगा गया।
रात को उसने पाँच बार बैग चेक किया—एडमिट कार्ड, पेन, पेंसिल, स्केल। फिर भी सोते-सोते अचानक उठकर पूछता, “माँ, एडमिट कार्ड उड़ तो नहीं गया?”
परीक्षा के दिन स्कूल पहुँचा तो देखा, बाकी दोस्त हँस-बोल रहे थे। किसी के सिर पर कोई भूत नहीं था। पेपर मिला तो आधे सवाल वही थे जो उसने पढ़े थे। धीरे-धीरे उसका डर उतरने लगा।
तीन घंटे बाद जब वह बाहर निकला तो चेहरे पर मुस्कान थी। बोला, “इतना भी कठिन नहीं था!” पिताजी हँसकर बोले, “भूत गया?” राहुल मुस्कुराया, “हाँ, अब रिज़ल्ट का नया भूत आने वाला है।”
घर लौटते ही उसने घोषणा की, “अब एक हफ्ता आराम!” लेकिन शाम तक अगली परीक्षा का सिलेबस देखकर फिर वही हाल—सिर पर भूत सवार परीक्षा का!