मोहल्ले में बबलू चाचा की बड़ी आदत थी—हर छोटी बात को बढ़ाकर बताने की। अगर किसी के घर से कुत्ता भौंक भी देता तो वह पूरे मोहल्ले में खबर फैला देते कि शायद कोई बड़ा झगड़ा होने वाला है।
एक दिन सुबह गली में मोहन का छोटा सा बेटा गेंद खेलते हुए अचानक गिर गया। उसे हल्की सी खरोंच आई और वह रोने लगा। मोहन ने तुरंत बच्चे को उठाया और घर ले जाकर मरहम लगा दिया। मामला वहीं खत्म हो गया होता, अगर बबलू चाचा वहाँ न पहुँचते।
बबलू चाचा ने मोहल्ले में घूमकर कहना शुरू कर दिया, “सुना है मोहन के घर बहुत बड़ा हादसा हो गया है! बच्चा अस्पताल पहुँच गया है!”
मोहल्ले वाले घबरा गए। किसी ने कहा, “कौन सा अस्पताल?” किसी ने फोन पर खबर फैलानी शुरू कर दी कि शायद बड़ा मामला हो गया है।
थोड़ी देर में मोहन खुद बाहर आया और बोला, “अरे भाई, बच्चा ठीक है, बस हल्की खरोंच लगी थी।”
लेकिन बबलू चाचा ने फिर भी अपनी बात नहीं छोड़ी। बोले, “मैंने तो अपनी आँखों से देखा था, बच्चा जोर से गिरा था।”
धीरे-धीरे यह बात इतनी फैल गई कि लोगों ने कहानी का रूप बदल दिया। किसी ने कहा बच्चा सीढ़ियों से गिरा, किसी ने कहा बाइक से टकरा गया, और किसी ने तो यह भी कह दिया कि घर में एम्बुलेंस बुलानी पड़ी।
शाम तक मोहल्ले में ऐसा माहौल बन गया जैसे कोई बड़ी आपदा आ गई हो।
मोहन परेशान होकर सबको समझाता रहा, “भाई, तिल का ताड़ मत बनाओ। छोटी सी बात थी।”
अगले दिन बबलू चाचा चाय की दुकान पर बैठे थे। तभी एक आदमी बोला, “चाचा, आपकी वजह से मोहल्ले में कल बहुत अफवाह फैली।”
बबलू चाचा मुस्कुराकर बोले, “मैं तो बस खबर साझा कर रहा था।”
दुकानदार हँसकर बोला, “चाचा, खबर साझा नहीं, बढ़ा-चढ़ाकर बता रहे थे।”
बबलू चाचा चुप हो गए और सोचने लगे कि कभी-कभी छोटी बात को बड़ा बनाना भी समस्या खड़ी कर देता है।
उस दिन के बाद मोहल्ले वालों ने तय किया कि पहले सच्चाई जानेंगे, फिर किसी बात को आगे बढ़ाएँगे।