रमेश को मोबाइल चलाने का बहुत शौक था। सुबह उठते ही सोशल मीडिया चेक करना, दिनभर दोस्तों से चैट करना और रात को सोते समय भी वीडियो देखने की आदत उसकी बन चुकी थी। उसे लगता था कि मोबाइल उसकी जिंदगी का सबसे अच्छा साथी है।
लेकिन हर महीने की एक तारीख आती थी और रमेश का दिल घबराने लगता था। वह तारीख थी मोबाइल बिल आने की तारीख।
इस बार बिल देखकर रमेश के होश उड़ गए। मोबाइल बिल इतना ज्यादा था कि उसे लगा जैसे बिल ने उसकी जेब पर कब्जा कर लिया हो। उसने धीरे से कहा, “लगता है मोबाइल मेरे गले की हड्डी बन गया है।”
पत्नी ने बिल देखकर पूछा, “इतना बिल कैसे आया?”
रमेश ने गंभीर होकर जवाब दिया, “शायद मोबाइल भी मेरे साथ घूमने का खर्च मांग रहा है।”
पत्नी ने कहा, “तुम रात भर वीडियो देखते हो, फिर बिल कम कैसे आएगा?”
रमेश ने सोचा और बोला, “अब से मैं मोबाइल को भी डाइट पर रखूँगा।”
अगले दिन उसने फैसला किया कि मोबाइल इस्तेमाल कम करेगा। उसने सबसे पहले अनावश्यक ऐप्स हटाए। फिर दोस्तों को मैसेज भेजा, “जरूरी बात हो तभी कॉल करना।”
दोस्तों ने मजाक में पूछा, “भाई, क्या मोबाइल बेचने का प्लान है?”
रमेश बोला, “नहीं, बस दोस्ती को थोड़ा सस्ता बनाने की कोशिश कर रहा हूँ।”
रात को वह मोबाइल को अपने तकिए के पास रखने की बजाय दूर टेबल पर रखने लगा। उसने वीडियो देखने का समय भी तय कर लिया—सिर्फ दस मिनट।
एक हफ्ते बाद रमेश ने महसूस किया कि बिना ज्यादा मोबाइल चलाए भी जिंदगी चल सकती है। वह शाम को परिवार के साथ बात करने लगा और चाय का मजा लेने लगा।
अगले महीने जब मोबाइल बिल आया तो रमेश खुश हो गया। बिल पहले से आधा था।
पत्नी मुस्कुराकर बोली, “देखा, मोबाइल को काबू में रखा तो गले की हड्डी भी निकल गई।”
रमेश ने राहत की सांस लेते हुए कहा, “अब मोबाइल मेरा दोस्त है, मालिक नहीं।”