राकेश बहुत साधारण किस्म का लड़का था। पढ़ाई में न बहुत तेज, न बहुत कमजोर। लेकिन किस्मत के मामले में वह हमेशा खुद को बदकिस्मत समझता था। वह अक्सर कहता, “मेरी किस्मत शायद छुट्टी पर चली गई है।”
एक दिन अचानक उसे एक बड़ी कंपनी में नौकरी के लिए इंटरव्यू का बुलावा आ गया। राकेश हैरान रह गया क्योंकि उसने तो आवेदन भी ठीक से याद नहीं किया था। उसने सोचा, “लगता है अंधे के हाथ बटेर लगने वाली बात सच होने वाली है।”
इंटरव्यू के दिन वह पुराने जूते पहनकर, बाल ठीक करके कंपनी पहुँच गया। अंदर कमरे में तीन बड़े अधिकारी बैठे थे। राकेश ने डरते-डरते नमस्ते किया।
पहला सवाल पूछा गया, “आप हमारी कंपनी के लिए क्या कर सकते हैं?”
राकेश ने सोचकर कहा, “सर, मैं काम ईमानदारी से कर सकता हूँ, ज्यादा बोलना नहीं, बस काम करना पसंद करता हूँ।”
दूसरा सवाल था, “अगर आपको मुश्किल काम दिया जाए तो?”
राकेश ने कहा, “सर, पहले समझने की कोशिश करूँगा, फिर धीरे-धीरे हल निकालूँगा।”
तीसरा सवाल सुनकर वह थोड़ा घबरा गया। पूछा गया, “आपको अगर नौकरी मिल गई तो सबसे पहले क्या करेंगे?”
राकेश ने मुस्कुराकर कहा, “सर, अपनी माँ के लिए मिठाई खरीदूँगा।”
अधिकारी उसकी सादगी से प्रभावित हो गए।
दो दिन बाद उसे नौकरी का ऑफर लेटर मिल गया। राकेश खुशी से उछल पड़ा। उसने जोर से कहा, “सच में, अंधे के हाथ बटेर लग गई!”
पहले महीने राकेश ने मेहनत से काम किया। वह देर तक ऑफिस में रुककर सीखता रहा। धीरे-धीरे उसकी ईमानदारी और लगन देखकर लोग उसे पसंद करने लगे।
एक दिन उसके मैनेजर ने कहा, “राकेश, तुमने कम समय में अच्छा काम सीखा है।”
राकेश मुस्कुराकर बोला, “सर, किस्मत भी मेहनत के साथ चलती है।”
कुछ महीनों बाद उसे प्रमोशन भी मिल गया। राकेश ने घर आकर कहा, “कभी-कभी किस्मत चुपचाप दरवाजा खटखटाती है, बस हमें पहचानना आना चाहिए।”
और वह सोचने लगा कि शायद सच ही है—जब मेहनत और सादगी साथ हो, तो अंधे के हाथ भी बटेर लग सकती है।