गाँव में रामू नाम का आदमी अपनी शेखीबाजी के लिए बहुत मशहूर था। उसे हर जगह अपनी बहादुरी और समझदारी का ढोल पीटने की आदत थी। चाहे चाय की दुकान हो या पंचायत का मैदान, रामू हमेशा खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी साबित करने में लगा रहता था।
एक दिन गाँव में मेले का आयोजन हुआ। मेले में रामू अपने नए चश्मे, चमकते जूते और बड़ी सी टोपी पहनकर पहुँचा। वहाँ खड़े लोगों से वह जोर-जोर से कहने लगा, “मैं तो ऐसा आदमी हूँ कि एक साथ दस लोगों से बहस जीत सकता हूँ।”
पास खड़े बूढ़े चाचा मुस्कुराकर बोले, “अच्छा, तो आज अपनी समझदारी का नमूना भी दिखा दो।”
इसी बीच मेले में एक कुश्ती प्रतियोगिता शुरू हो गई। रामू ने भीड़ के सामने सीना फुलाकर कहा, “अगर कोई मुझे चुनौती दे तो मैं उसे चुटकी में हरा दूँगा।”
भीड़ में से एक पतला सा लड़का आगे आया और बोला, “ठीक है, पहलवान जी, पहले यह बताओ कि ताकत ज्यादा जरूरी है या दिमाग?”
रामू ने बिना सोचे कहा, “ताकत! दिमाग तो मेरे पास पहले से बहुत है।”
लड़के ने मुस्कुराकर कहा, “फिर ठीक है, मुकाबला शुरू।”
मुकाबला शुरू हुआ और कुछ ही सेकंड में रामू अपनी ही शेखी के चक्कर में लड़खड़ाकर जमीन पर बैठ गया। भीड़ हँसने लगी। रामू उठकर बोला, “मैं तो सिर्फ जमीन की मजबूती जांच रहा था।”
लेकिन लोगों ने चुटकी लेते हुए कहा, “आज तो शेखीबाज ने सच में मुँह की खाई है।”
रामू शर्मिंदा तो हुआ, पर उसने सबक भी सीख लिया। अगले दिन वह चुपचाप चाय की दुकान पर बैठकर सिर्फ चाय पी रहा था और किसी को अपनी बहादुरी की कहानी नहीं सुना रहा था।
अब गाँव वाले कहते थे, “शेखी ज्यादा हो तो आदमी खुद ही फिसल जाता है।” और रामू मन ही मन सोचता था, “अच्छा हुआ, आज शेखी नहीं, समझदारी काम आई।”