सुबह ऑफिस जाने की जल्दी थी और रमेश ने सोचा आज जल्दी निकल जाएगा। लेकिन शहर के ट्रैफिक ने जैसे उसकी किस्मत की घड़ी ही रोक दी थी।
जैसे ही वह बाइक लेकर सड़क पर पहुँचा, सामने लंबी गाड़ियों की लाइन देखकर उसका माथा ठनक गया। ट्रैफिक ऐसा था जैसे सारे लोग उसी रास्ते से पिकनिक मनाने निकल पड़े हों। हॉर्न बज रहे थे, लोग चिल्ला रहे थे, और एक आदमी तो ऐसा हॉर्न बजा रहा था जैसे दुनिया खत्म होने वाली हो।
धूप भी धीरे-धीरे तेज हो रही थी। हेलमेट के अंदर रमेश का सिर ऐसे पक रहा था जैसे कुकर में सब्जी। उसने सोचा हेलमेट उतार दूँ, पर पीछे ट्रैफिक पुलिस वाले की नजर देखकर मन बदल गया।
उसके आगे वाली कार अचानक रुक गई। रमेश ने हल्का सा हॉर्न बजाया। जवाब में पीछे से इतना तेज हॉर्न बजा कि लगा कोई शादी का बैंड शुरू हो गया हो।
पास खड़े एक आदमी ने कहा, “भाई, आज तो ट्रैफिक भगवान भरोसे है।” रमेश बोला, “भगवान भी शायद जाम में फँसे होंगे।”
पाँच मिनट बाद आगे की गाड़ी धीरे-धीरे सरकी। रमेश ने सोचा आज तो चल पड़ेगा। लेकिन तभी एक स्कूटर वाला बीच में से घुसकर बोला, “जरा जगह दे दो भाई, जरूरी काम है।” रमेश मन ही मन बोला, “सबका काम जरूरी है, मेरा ऑफिस जाना गैरजरूरी है क्या?”
आधे घंटे बाद उसकी खोपड़ी पूरी तरह गर्म हो चुकी थी। उसे लगा जैसे दिमाग में चाय उबल रही हो। उसने बाइक स्टार्ट-स्टॉप करते हुए सोचा, “ट्रैफिक में आदमी जल्दी नहीं, बस बूढ़ा जरूर हो जाता है।”
आखिरकार ट्रैफिक खुला। रमेश ने राहत की सांस ली और बाइक को हवा की तरह दौड़ाया। रास्ते में उसने खुद से वादा किया कि अगली बार पाँच मिनट पहले निकलेगा।
ऑफिस पहुँचकर उसने पानी पिया और मुस्कुराकर बोला, “ट्रैफिक ने आज धैर्य का असली टेस्ट ले लिया।”
शाम को घर लौटते समय फिर ट्रैफिक देखकर उसने धीमे से कहा, “लगता है आज फिर खोपड़ी गर्म होने वाली है।”