रमेश का सपना था कि उसके पास अपनी एक चमचमाती बाइक हो। लेकिन जेब हमेशा ऐसी थी जैसे महीने का आखिरी दिन ही शुरू हो गया हो। दोस्तों की बाइक देखकर उसका दिल कहता, “काश! हवा से बातें करने वाली एक बाइक मेरी भी होती।”
आखिर उसने फैसला किया—“अब पेट काटकर ही सही, बाइक खरीदूँगा।” अगले महीने से रमेश ने खर्चों पर ऐसी कैंची चलाई कि घर वाले भी हैरान रह गए।
चाय में चीनी आधी कर दी, समोसे की जगह सिर्फ खुशबू सूँघ ली, और मूवी देखने की जगह टीवी के सामने आँखें बंद करके ही काम चला लिया। दोस्तों ने पूछा, “भाई, बीमार तो नहीं हो?” रमेश मुस्कुराकर बोला, “नहीं, मैं भविष्य की तैयारी कर रहा हूँ।”
छह महीने बाद उसने बैंक खाते में कुछ पैसे जमा कर लिए। फिर एक दिन शोरूम जाकर अपनी पसंद की बाइक खरीद ली। नई बाइक देखकर वह ऐसा खुश हुआ जैसे बचपन में नया खिलौना मिला हो।
घर आते ही उसने बाइक को आँगन में खड़ा किया और हर पाँच मिनट बाद जाकर उसे साफ करने लगा। पड़ोसी बोले, “इतना प्यार तो अपनी पत्नी को भी नहीं देता।”
अगले दिन रमेश ऑफिस गया तो सबको अपनी बाइक की कहानी सुनाने लगा। दोस्त बोले, “अब पेट काटना बंद कर दे, कहीं सच में पेट ही न कट जाए।”
लेकिन रमेश ने किसी की नहीं सुनी। वह हर शाम बाइक को स्टार्ट करता, दो मिनट चलाता और वापस पार्क कर देता। पेट्रोल बचाने के लिए उसने तय किया कि बाइक ज्यादा दौड़ेगी नहीं, सिर्फ चमकेगी।
एक दिन पत्नी बोली, “बाइक तो ले ली, अब घर का खर्च कैसे चलेगा?” रमेश ने गंभीर होकर कहा, “प्यार से।”
फिर महीने के अंत में रमेश का हाल ऐसा हो गया जैसे बाइक ने पेट काटकर उसकी जेब में फिर से छेद कर दिया हो।
लेकिन रमेश खुश था। वह सोचता, “भले ही पेट थोड़ा हल्का हो गया, पर सपनों की सवारी मिल गई।”
और वह हर सुबह बाइक को देख कर मुस्कुराते हुए ऑफिस जाने लगा, मानो कह रहा हो—“पेट काटा, लेकिन सपना नहीं।”