दादी माँ वैसे तो बहुत शांत स्वभाव की थीं, लेकिन जब गुस्सा आती थीं तो उनका गुस्सा पूरे घर में मशहूर था। उस दिन सुबह से ही घर में कुछ न कुछ गड़बड़ चल रहा था। सबसे पहले छोटा पोता राजू दूध का गिलास गिराकर भाग गया। फिर बड़ी बहू ने रसोई में नमक की जगह चीनी डाल दी। दादी माँ बस चुपचाप सब देखती रहीं।
दोपहर होते-होते असली मामला शुरू हुआ। पड़ोस की चाची आईं और कहने लगीं कि गली के बच्चों ने आम के पेड़ से कच्चे आम तोड़ लिए हैं। दादी माँ ने पूछा, “किसने तोड़े?” चाची ने इधर-उधर देखकर कहा, “शायद राजू भी था।” बस यही सुनना था। दादी माँ का चेहरा लाल हो गया।
दादी माँ जोर से बोलीं, “राजू को बुलाओ!” राजू डरते-डरते सामने आया। दादी माँ ने पूछा, “तूने आम तोड़े?” राजू ने पहले तो ना कहा, लेकिन फिर धीरे से सिर हिलाया। बस, फिर क्या था, दादी माँ आग बबूला हो गईं।
उन्होंने डंडा उठाने की कोशिश की, लेकिन घर की बहू ने बीच में आकर समझाया। दादी माँ गुस्से में बोलीं, “आजकल के बच्चे बिल्कुल नहीं सुनते!” उनका गुस्सा देखकर राजू की आंखों में आंसू आ गए।
थोड़ी देर बाद दादा जी कमरे से बाहर आए और बोले, “गुस्सा करने से आम वापस नहीं आएंगे।” दादी माँ ने गहरी सांस ली। उन्होंने राजू को पास बुलाया और कहा, “बेटा, पेड़ से बिना पूछे फल नहीं तोड़ते।”
राजू ने हाथ जोड़कर माफी मांगी। दादी माँ का गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगा। उन्होंने राजू के सिर पर हाथ फेरकर कहा कि गलती करने पर माफी मांगना सबसे बड़ा काम होता है।
शाम को दादी माँ ने खुद राजू के लिए हलवा बनाया। घर का माहौल फिर से सामान्य हो गया। राजू समझ गया कि दादी माँ गुस्सा जरूर करती हैं, लेकिन उनका दिल बहुत नरम है।
उस दिन के बाद राजू ने कभी बिना पूछे पेड़ से फल नहीं तोड़े। और दादी माँ भी सोचती रहीं कि बच्चों को समझाने का सबसे अच्छा तरीका प्यार ही होता है, गुस्सा नहीं।