हमारे मोहल्ले में खबरें कभी सीधी नहीं चलती थीं; वे हमेशा रास्ते में नमक-मिर्च लगाकर ही आगे बढ़ती थीं। एक दिन सुबह-सुबह बस इतना हुआ कि शर्मा जी ने अपने घर के बाहर एक नई प्लास्टिक की कुर्सी रख दी। उनका इरादा बहुत साधारण था—धूप सेंकते हुए अख़बार पढ़ना और कमर दर्द से थोड़ी राहत पाना।
सबसे पहले यह दृश्य वर्मा आंटी की नजर में आया। उन्होंने खिड़की से झाँकते ही अनुमान लगा लिया कि जरूर कोई खास मेहमान आने वाला है। पाँच मिनट के भीतर यह सूचना गुप्ता आंटी तक पहुँची, लेकिन वहाँ पहुँचते-पहुँचते खबर का रंग बदल चुका था। अब बात मेहमान से आगे बढ़कर “रिश्ता देखने आने वालों” तक पहुँच गई थी।
दोपहर होते-होते आधे मोहल्ले को विश्वास हो गया कि शर्मा जी की बेटी की सगाई पक्की हो चुकी है। किसी ने जोड़ा कि लड़का विदेश में नौकरी करता है। किसी ने कहा कि दहेज में कार भी तय हो गई है। खबर इतनी सज-धजकर फैल चुकी थी कि सच्चाई खुद पहचान में न आए।
शाम को अचानक शर्मा जी के दरवाजे पर भीड़ लग गई। कोई मिठाई लेकर आया, कोई बधाई देने। शर्मा जी हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, “भाई, बात क्या है?” जब उन्हें बताया गया कि बेटी की सगाई की खुशी मनाई जा रही है, तो वे कुछ पल के लिए चुप रह गए। फिर हँसते हुए बोले, “अरे भई, यह कुर्सी तो मैंने अपनी कमर सीधी करने के लिए रखी है, सगाई के लिए नहीं!”
कुछ क्षणों का सन्नाटा छाया, फिर सबने बात को हल्के में लेने की कोशिश की। पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अगले दिन नई चर्चा शुरू हो गई कि “कल वाली बात से शर्मा जी नाराज़ हो गए हैं।”
इस तरह एक साधारण कुर्सी ने पूरे मोहल्ले में उत्सव और फिर अफवाह का माहौल बना दिया। सच छोटा था, लेकिन नमक-मिर्च लगी खबर ने उसे इतना बड़ा बना दिया कि वह खुद ही कहानी बन गया।