बाबूजी गाँव के सबसे समझदार और दूरदर्शी इंसान माने जाते थे। लोग अक्सर कहते थे कि अगर बाबूजी किसी काम की सलाह दे दें तो आधी समस्या खुद ही हल हो जाती है। लेकिन अपने बेटे राकेश के मामले में बाबूजी की समझदारी भी कभी-कभी फेल हो जाती थी।
राकेश पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन उसे जल्दी अमीर बनने का सपना बहुत पसंद था। कॉलेज के बाद उसने अपने दोस्त के साथ मिलकर एक नया स्टार्टअप शुरू करने का फैसला किया। बाबूजी ने समझाया कि बिना योजना के बड़ा कदम नहीं उठाना चाहिए, पर राकेश ने कहा, “आज के जमाने में रिस्क ही सफलता की कुंजी है।”
शुरुआत में कारोबार थोड़ा चला, फिर अचानक बाजार में नई कंपनी आ गई। उनके ग्राहकों की संख्या कम होने लगी। खर्च बढ़ता गया, लेकिन आय घटने लगी। राकेश ने सोचा कि थोड़ा और पैसा लगा देने से सब ठीक हो जाएगा। उसने घर की बचत भी उसी कारोबार में लगा दी।
बाबूजी बार-बार कहते, “धीरे चलो बेटा, जल्दबाजी में कदम मत उठाओ।” लेकिन राकेश को अपनी समझ पर ज्यादा भरोसा था। कुछ महीनों बाद हालात ऐसे हो गए कि कंपनी बंद करने की नौबत आ गई। बैंक का कर्ज सिर पर आ गया और बचत का पैसा भी खत्म हो गया।
एक दिन राकेश घर बैठा चुपचाप सोच रहा था। बाबूजी उसके पास आए और बोले, “मैंने तुम्हें रोका था, लेकिन अब पछतावा करने का समय नहीं है।” उनकी आवाज में गुस्सा नहीं, बल्कि दर्द था। राकेश की आँखें भर आईं।
उस दिन राकेश को समझ आया कि सपने देखना गलत नहीं है, लेकिन बिना योजना के दौड़ना खतरनाक हो सकता है। उसने फिर से नौकरी ढूंढनी शुरू की और धीरे-धीरे अपने जीवन को संभालने लगा।
बाबूजी उसे काम करते देखकर चुपचाप मुस्कुराते थे, लेकिन एक बात अक्सर कहते, “पैसा आना-जाना है, पर अनुभव हमेशा साथ रहता है।”
आज जब भी राकेश किसी युवा को जल्दी अमीर बनने की सलाह देते देखता है, वह मुस्कुराकर सोचता है कि उस दिन बाबूजी सही थे। वरना वह भी हाथ मलते रह जाता।