शर्मा जी ने बड़े गर्व से घोषणा की थी कि इस बार वे “सभ्य और संस्कारी” किरायेदार ही रखेंगे। पिछले अनुभवों ने उन्हें बहुत कुछ सिखा दिया था। लेकिन जैसे ही वर्मा जी अपना सूटकेस और तीन गमले लेकर घर में दाखिल हुए, शर्मा जी को लगा कि किस्मत फिर से मज़ाक करने वाली है।
शुरुआत तो बड़ी अच्छी हुई। वर्मा जी ने कहा, “मैं बहुत शांत स्वभाव का हूँ, बस किताबें पढ़ता हूँ।” तीसरे ही दिन पता चला कि उनकी “किताबें” दरअसल मोटिवेशनल वीडियो हैं, जो स्पीकर पर पूरी कॉलोनी को प्रेरित करते हैं। सुबह पाँच बजे “उठो, जागो!” की आवाज़ से शर्मा जी की नींद खुलती और वे सोचते कि किराया कम है या धैर्य?
फिर आया किचन का अध्याय। वर्मा जी खुद को प्रयोगधर्मी शेफ मानते थे। एक दिन उन्होंने यूट्यूब देखकर इटालियन पास्ता बनाया, जिसकी खुशबू इतनी प्रबल थी कि शर्मा जी की बिल्ली तक घर छोड़कर भाग गई। पूछने पर बोले, “नई डिश है, आदत पड़ जाएगी।” शर्मा जी ने मन ही मन सोचा कि पहले खुद को आदत डालो।
बिजली का बिल आते ही असली झटका लगा। एसी, कूलर, हीटर सब एक साथ चलाने की उनकी अनोखी आदत थी। तर्क यह था कि “संतुलन बना रहता है।” शर्मा जी ने समझाया कि यह घर है, पावर प्लांट नहीं। वर्मा जी मुस्कुराकर बोले, “मैं वैज्ञानिक सोच रखता हूँ।”
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। हर महीने किराया देते समय वे नई कहानी सुनाते। कभी बैंक का सर्वर डाउन, कभी यूपीआई की आत्मा दुखी। अंत में पैसे मिल ही जाते, पर शर्मा जी का ब्लड प्रेशर बढ़ाकर।
एक दिन हद तब हो गई जब वर्मा जी ने छत पर कबूतरों के लिए दाना डालना शुरू कर दिया। देखते-देखते छत कबूतर सम्मेलन का स्थल बन गई। शर्मा जी ने सख्ती दिखाई। वर्मा जी ने तर्क दिया, “पक्षियों का भी तो हक है।” शर्मा जी बोले, “पर छत मेरी है!”
आखिरकार एक सुबह वर्मा जी ने खुद ही कहा कि उन्हें “प्रेरणा के नए अवसर” मिल गए हैं और वे जा रहे हैं। उनके जाते ही घर में सन्नाटा था, पर सुकून भी। शर्मा जी ने राहत की सांस ली और बुदबुदाए, “अबकी बार किरायेदार नहीं, भगवान का प्रसाद ही