विकास पहले गली के कोने पर मोबाइल रिपेयर की छोटी-सी दुकान चलाता था। मेहनती था, लेकिन कमाई बस गुज़ारे लायक होती थी। एक दिन उसने अपने दोस्त के साथ मिलकर एक छोटा-सा ऑनलाइन गैजेट स्टोर शुरू किया।
किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि छह महीने में उसका कारोबार तेजी से बढ़ गया। अचानक उसके खाते में इतने पैसे आ गए, जितने उसने सपने में भी नहीं सोचे थे।
पैसा आते ही विकास की चाल बदल गई। पहले जो लड़का साइकिल से दुकान जाता था, अब चमचमाती कार में घूमने लगा। पुराने दोस्तों के साथ चाय पीने की जगह उसने महंगे कैफे चुन लिए। बात-बात पर अंग्रेज़ी के शब्द डालने लगा।
मोहल्ले के लोग कहते, “विकास को पैसे नहीं, पंख लग गए हैं।” सच भी यही था—वह जमीन पर कम, हवा में ज्यादा उड़ने लगा था।
एक दिन उसने अपने माता-पिता के लिए नया फ्लैट खरीदा, लेकिन पुराने घर को बेचते समय उसने पड़ोसियों को बुलाना जरूरी नहीं समझा। उसे लगा कि अब वह एक अलग स्तर का इंसान है। पिता ने धीरे से कहा, “बेटा, ऊँचाई अच्छी है, पर जड़ें मत काटना।” विकास ने मुस्कुराकर बात टाल दी।
समय ने फिर करवट ली। बाजार में नई कंपनियाँ आ गईं। प्रतियोगिता बढ़ी और बिक्री गिरने लगी। कुछ गलत निवेश भी हो गए। छह महीनों में मुनाफा आधा रह गया। विकास को पहली बार समझ आया कि पैसा जितनी जल्दी आता है, उतनी ही जल्दी जा भी सकता है। जिन दोस्तों से उसने दूरी बना ली थी, वही अब उसे हिम्मत दे रहे थे। मोहल्ले की चाय की दुकान पर बैठकर उसे फिर सुकून मिला।
विकास ने धीरे-धीरे अपने व्यवहार में बदलाव किया। उसने पुराने ग्राहकों से दोबारा संपर्क किया, व्यवसाय को स्थिर करने पर ध्यान दिया और दिखावे की बजाय समझदारी को चुना। उसे अहसास हुआ कि असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, रिश्तों और विनम्रता में होती है।
अब जब भी कोई उसे सफलता की बधाई देता है, वह मुस्कुराकर कहता है, “हवा में उड़ना अच्छा है, पर पैर जमीन पर ही टिके रहने चाहिए।”