रिजल्ट डे का नाम सुनते ही रोहन के पेट में तितलियाँ नहीं, सीधे बकरियाँ दौड़ने लगती थीं। इस बार मामला बोर्ड परीक्षा का था, इसलिए घर का माहौल भी किसी युद्ध-पूर्व बैठक जैसा गंभीर था। मम्मी सुबह से ही मंदिर के चक्कर लगा रही थीं और पापा बार-बार कह रहे थे, “जो होगा, देखा जाएगा,” लेकिन उनकी आवाज़ में भी हल्की कंपन साफ़ थी।
रिजल्ट ऑनलाइन आना था। सुबह दस बजे वेबसाइट खुलनी थी। नौ बजकर पचपन मिनट पर ही रोहन लैपटॉप लेकर बैठ गया। जैसे ही घड़ी ने दस बजाए, वेबसाइट ने जवाब दे दिया—“Server Busy।” रोहन का दिमाग उसी समय से दही बनना शुरू हो गया। उसने पाँच बार रिफ्रेश किया, फिर मोबाइल से कोशिश की, फिर दोस्त को फोन लगाया। उधर से भी वही जवाब—“भाई, खुल ही नहीं रही!”
दस बजकर बीस मिनट पर वेबसाइट खुली, लेकिन रोल नंबर डालते ही फिर एरर। रोहन को लगने लगा कि शायद ब्रह्मांड उसे संकेत दे रहा है कि रिजल्ट अच्छा नहीं है। उसने मन ही मन अपनी संभावित फेल होने की कहानी भी बना ली—कैसे वह रिश्तेदारों के सवालों से बचेगा, कैसे अगले साल फिर पढ़ेगा, और कैसे दोस्तों के सामने मुस्कुराएगा।
आखिरकार दस बजकर चालीस मिनट पर स्क्रीन पर मार्कशीट आ गई। रोहन ने एक आँख बंद करके दूसरी से नंबर देखने की कोशिश की। पहले विषय में अच्छे अंक थे। दूसरे में उम्मीद से बेहतर। तीसरे में तो क्लास से भी ज्यादा। धीरे-धीरे पूरी मार्कशीट सामने थी, और कुल प्रतिशत देखकर वह कुछ सेकंड तक स्क्रीन को घूरता रहा। यह वही रिजल्ट था, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी—उसे शानदार अंक मिले थे।
पीछे खड़ी मम्मी ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ?” रोहन ने पलटकर सिर्फ इतना कहा, “दही मीठा निकला।” पापा ने चश्मा लगाकर नंबर देखे और पहली बार खुलकर हँसे।
उस दिन रोहन ने समझा कि असली डर रिजल्ट से नहीं, इंतज़ार से होता है। दिमाग का दही ज्यादा सोचने से बनता है, नतीजों से नहीं। रिजल्ट डे खत्म होते-होते घर में जश्न था, और रोहन के चेहरे पर