हमारे परिवार की हर खुशी में एक खास मेहमान ज़रूर शामिल होती हैं—बुआ शारदा। उन्हें हम प्यार से “चार चाँद लगाने वाली बुआ” कहते हैं, क्योंकि वे जिस भी कार्यक्रम में पहुँचती हैं, वहाँ सचमुच चार नहीं, चालीस चाँद लगा देती हैं। फर्क बस इतना है कि ये चाँद कभी-कभी पटाखों की तरह फूटते भी हैं।
पिछले महीने चचेरी बहन की शादी थी। घर में सादगी से रस्में निभाने की योजना बनी थी, लेकिन बुआ के आते ही सादगी ने कोने में बैठकर रोना शुरू कर दिया। बुआ ने सूटकेस खोला तो उसमें कपड़ों से ज्यादा सुझाव निकले। “ये परदे हल्के हैं, दूल्हे के मामा पर भारी नहीं पड़ेंगे,” उन्होंने पहली ही शाम ऐलान कर दिया। अगले ही दिन नए परदे लग गए।
मेहंदी की रात बुआ ने डीजे वाले को अलग बुलाकर प्लेलिस्ट बदलवा दी। “शादी है या शोकसभा?” कहकर उन्होंने पुराने गानों की जगह ठुमके वाले गाने लगवा दिए। खुद स्टेज पर चढ़कर ऐसा नाचीं कि दुल्हन भी शर्माकर किनारे हो गई। लोग मोबाइल निकाल-निकालकर वीडियो बनाने लगे। बुआ गर्व से बोलीं, “देखा, अब आई न रौनक!”
खाने की व्यवस्था में भी उनका योगदान ऐतिहासिक रहा। हलवाई बेचारा पसीना पोंछता रहा और बुआ चख-चखकर राय देती रहीं। “जलेबी में जोश कम है,” उन्होंने गंभीर चेहरे से कहा। हलवाई ने तुरंत दो करछी घी और डाल दिया। नतीजा यह हुआ कि मेहमानों ने जलेबी की तारीफ की, और बुआ ने उसे अपनी जीत घोषित कर दिया।
विदाई के समय जब सब भावुक थे, बुआ ने माहौल हल्का कर दिया। दूल्हे से बोलीं, “बेटा, हमारी बिटिया को परेशान किया तो मैं खुद आकर तुम्हें नचाऊँगी।” सब हँस पड़े, दुल्हन भी आँसू पोंछते-पोंछते मुस्कुरा दी।
शादी खत्म होने के बाद घर थोड़ा खाली-खाली लगा। शोर कम था, पर मज़ा भी कम था। तब समझ आया कि बुआ सचमुच चार चाँद लगाती हैं। थोड़ी अफरा-तफरी, थोड़ा हंगामा, और ढेर सारी हँसी—यही तो उनकी खासियत है। अब अगली शादी का इंतज़ार है, क्योंकि बुआ के बिना समारोह अधूरा ही लगता