हमारे शहर में लाला बद्रीप्रसाद अपनी कंजूसी और सख्ती के लिए मशहूर थे। उनकी किराने की दुकान पर तौल से लेकर तोलने वाले तक सब पर नजर रहती थी। वे हर समय यही कहते रहते, “दुकान में एक दाना भी कम नहीं होना चाहिए।” एक दिन उन्होंने नया नौकर रखा—नाम था भोला। नाम से भले भोला लगे, लेकिन उसकी आँखों में तेज साफ झलकता था।
पहले ही दिन लाला जी ने उसे डरा दिया, “अगर हिसाब में एक पैसा भी कम हुआ तो तेरे कान काट लूँगा।” भोला ने सिर झुकाकर “जी मालिक” कहा, पर मन ही मन मुस्कुराया। उसने जल्दी ही समझ लिया कि मालिक डर दिखाकर काम करवाना चाहते हैं।
कुछ दिनों बाद भोला ने एक योजना बनाई। उसने दुकान के बाहर एक बोर्ड टाँग दिया—“आज विशेष छूट, सीमित समय के लिए।” यह देखकर ग्राहक टूट पड़े। जो सामान महीनों से धूल खा रहा था, वह भी तेजी से बिकने लगा। शाम तक दुकान में अच्छी-खासी कमाई हो चुकी थी।
जब लाला जी लौटे तो दुकान पर भीड़ देखकर चौंक गए। उन्होंने घबराकर पूछा, “ये क्या हो रहा है?” भोला ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, “मालिक, बिक्री बढ़ा रहा हूँ।” रात को जब हिसाब-किताब हुआ तो मुनाफा उम्मीद से ज्यादा निकला। लाला जी खुश तो हुए, लेकिन बोर्ड की बात याद आते ही उनका माथा गर्म हो गया।
उन्होंने सख्त आवाज में पूछा, “छूट देने को किसने कहा?”
भोला ने शांत भाव से कहा, “मालिक, आपने ही तो कहा था कि एक पैसा भी कम हुआ तो कान काट लेंगे। मैंने सोचा, ज्यादा बिक्री होगी तो कमी का सवाल ही नहीं उठेगा।”
लाला जी कुछ पल के लिए निरुत्तर रह गए। पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि डर से ज्यादा असर समझदारी का होता है। मोहल्ले में यह बात फैल गई कि भोला ने बिना छुए ही मालिक के कान काट लिए—अक्ल से।
उस दिन के बाद लाला जी का रवैया थोड़ा नरम हो गया, और भोला की तनख्वाह भी बढ़ गई।