अमित एक साधारण नौकरीपेशा युवक था, जो रोज़ की तरह उस दिन भी मेट्रो से ऑफिस जा रहा था। महीने का आखिरी हफ्ता चल रहा था और जेब में बस उतने ही पैसे बचे थे, जितने से घर और दफ्तर का काम चल सके। भीड़ काफी थी, इसलिए वह दरवाज़े के पास खड़ा रहा। स्टेशन आने पर जैसे ही वह जल्दी-जल्दी बाहर निकला, उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसकी जेब से बटुआ गिर चुका है।
ऑफिस पहुंचकर जब उसने चाय के पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला, तो उसका चेहरा उतर गया। बटुआ गायब था। उसमें पैसे तो थे ही, साथ में आधार कार्ड, एटीएम कार्ड और कुछ जरूरी रसीदें भी थीं। उसके माथे पर पसीना आ गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि पहले क्या करे। उसने तुरंत अपने बैंक को फोन कर कार्ड ब्लॉक करवाया और फिर मेट्रो स्टेशन के कस्टमर केयर पर कॉल किया, लेकिन कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी।
उदास मन से वह काम में लग गया, पर ध्यान बार-बार उसी बात पर जा रहा था। लंच के समय उसके फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आया। दूसरी तरफ एक शांत आवाज़ थी। उस व्यक्ति ने बताया कि उसे मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास एक बटुआ मिला है, जिसमें अमित का पहचान पत्र था। उसने मिलने के लिए पास के पुलिस बूथ का स्थान बताया।
अमित तुरंत वहां पहुंचा। सामने एक साधारण कपड़े पहने मध्यम आयु का व्यक्ति खड़ा था। उसने मुस्कुराकर बटुआ आगे बढ़ा दिया। अमित ने घबराहट में बटुआ खोला—सारे पैसे और कार्ड सुरक्षित थे। उसकी आंखों में राहत झलक आई। उसने धन्यवाद देते हुए कुछ पैसे इनाम के रूप में देने चाहे, लेकिन उस व्यक्ति ने विनम्रता से मना कर दिया। उसने सिर्फ इतना कहा, “आज आपका था, कल मेरा भी हो सकता है।”
अमित घर लौटते समय हल्का महसूस कर रहा था। उसे लगा कि इस भागदौड़ भरी दुनिया में ईमानदारी अब भी जिंदा है। खोया हुआ बटुआ सिर्फ सामान नहीं था, वह भरोसे की वापसी भी था। उस दिन के बाद अमित ने तय किया कि अगर कभी उसे भी किसी की खोई हुई चीज़ मिलेगी, तो वह बिना हिचक उसे लौटाएगा।