हमारी कॉलोनी में रचना नाम की एक सहेली रहती थी, जो अपने मीठे स्वभाव से ज्यादा अपनी आदतों के लिए मशहूर थी। वह देखने में भोली और बोलने में शहद घोलने वाली थी, लेकिन उसकी बातों में अक्सर मिर्च-मसाला मिला होता था। उसे किसी से सीधे झगड़ा करना पसंद नहीं था; उसे तो बस लोगों के कानों में हल्की-सी फूंक मारनी आती थी।
रचना की खासियत थी कि वह हर घर की खबर रखती थी। सुबह टहलते हुए किसी से पूछती, “सब ठीक तो है?” और जवाब सुनने से पहले ही एक वाक्य छोड़ देती—“वैसे मैंने कुछ सुना है, पर रहने दो।” बस, सामने वाला वहीं से कहानी बुनना शुरू कर देता। वह कभी पूरी बात नहीं बताती थी, ताकि बाकी काम कल्पना कर ले।
एक दिन उसने सीमा से यूँ ही कहा कि शालू उसकी साड़ी पर हंस रही थी। सीमा ने बात को हल्के में लिया, पर मन में एक शंका बैठ गई। दिनभर वह शालू के व्यवहार में संकेत ढूंढती रही। शाम तक दोनों के बीच ठंडी तकरार शुरू हो गई। रचना दूर से सब देखती रही, मानो कोई मनोरंजन कार्यक्रम चल रहा हो।
लेकिन हर बार किस्मत उसका साथ नहीं देती। एक बार उसने दो सहेलियों को अलग-अलग बातें बताकर भड़काने की कोशिश की। संयोग से दोनों आमने-सामने बैठ गईं और सच्चाई सामने आ गई। रचना की मुस्कान फीकी पड़ गई।
पहली बार लोगों ने उसकी आदत पर खुलकर बात की।
कॉलोनी की बैठक में तय हुआ कि बिना पुष्टि किसी बात पर विश्वास नहीं किया जाएगा। रचना को सीधे कुछ नहीं कहा गया, पर सबने इशारों में समझा दिया कि अब कान भरना आसान नहीं रहेगा। धीरे-धीरे उसने भी अपनी आदत पर थोड़ा नियंत्रण करना सीख लिया।
आज भी वह मीठा बोलती है, पर लोग समझदार हो गए हैं। सबने सीख लिया है कि दोस्ती में हंसी-मजाक चलेगा, पर भरोसे में जहर घोलने की इजाजत किसी को नहीं।