हमारी मौसी का नाम सुशीला था, पर मोहल्ले में उन्हें “आँखें दिखाने वाली मौसी” कहा जाता था। वजह साफ थी—उनकी बड़ी-बड़ी आंखें किसी भी शरारती बच्चे को मिनटों में सीधा कर देती थीं। कहते हैं कि एक बार दूधवाला पानी मिलाकर आया, मौसी ने सिर्फ आंखें तरेरीं और अगले दिन से दूध में मलाई तैरने लगी।
मौसी का एंट्री स्टाइल पूरी तरह फिल्मी था। दरवाज़ा हल्का सा धक्का, साड़ी का पल्लू हवा में लहराता और बैकग्राउंड में मानो खुद-ब-खुद कोई ड्रामेटिक म्यूज़िक बज उठता। जैसे ही वे ड्राइंग रूम में बैठतीं, पूरा घर सावधान की मुद्रा में आ जाता। पापा अखबार सीधा पकड़ लेते, मम्मी चाय में चीनी नापकर डालतीं और हम बच्चे होमवर्क की किताबें खोलकर ऐसे बैठते जैसे सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हों।
एक बार मैंने और मेरे भाई ने फ्रिज से आइसक्रीम चुपके से निकाल ली। किस्मत खराब थी, मौसी उसी वक्त किचन में आ गईं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस धीरे से चश्मा उतारा और आंखें दिखाई। हमें लगा कैमरा ज़ूम इन हो रहा है, पसीना बैकग्राउंड इफेक्ट की तरह टपकने लगा। हम दोनों ने तुरंत स्वीकार कर लिया, “मौसी, गलती हो गई!” मौसी ने डायलॉग मारा, “सच बोलने वाले को माफी मिलती है, पर दोबारा गलती की तो इंटरवल नहीं, सीधे क्लाइमेक्स होगा।”
मोहल्ले में भी उनका रौब था। पड़ोसी शर्मा अंकल ने एक दिन गाड़ी हमारे गेट के सामने खड़ी कर दी। मौसी बाहर आईं, सिर्फ एक नजर डाली और बोलीं, “गाड़ी हटाइए, वरना कहानी लंबी हो जाएगी।” पाँच सेकंड में गाड़ी गायब।
लेकिन सच कहें तो मौसी दिल की बहुत नरम थीं। परीक्षा में अच्छे नंबर लाओ तो सबसे पहले मिठाई वही खिलातीं। बीमार पड़ो तो पूरी रात सिरहाने बैठतीं। उनकी आंखों में डांट कम, चिंता ज्यादा छिपी रहती थी।
आज भी जब मौसी घर आती हैं, हम सब मुस्कुरा देते हैं। डर तो अब भी लगता है, पर भीतर से सुकून भी आता है। क्योंकि हर फिल्मी कहानी में एक सख्त किरदार जरूरी होता है, और हमारी जिंदगी की सुपरहिट फिल्म में वो रोल मौसी ने ही निभाया है।