सोमवार की सुबह ऑफिस में अचानक हड़कंप मच गया। अकाउंट्स विभाग से खबर आई कि कैश बॉक्स से पचास हजार रुपये गायब हैं। बात आग की तरह फैल गई। बॉस ने तुरंत इमरजेंसी मीटिंग बुला ली। उनका चेहरा इतना गंभीर था कि लग रहा था मानो किसी क्राइम थ्रिलर फिल्म की शूटिंग चल रही हो। सीसीटीवी भी उसी रात से बंद था, जिससे मामला और संदिग्ध हो गया।
मीटिंग रूम में सभी कर्मचारियों को बैठा दिया गया। बैग चेक होने लगे, दराजें खुलवाई गईं और आईटी टीम से रिकॉर्ड खंगालने को कहा गया। माहौल में सन्नाटा और डर दोनों तैर रहे थे। तभी अचानक रमेश खड़ा हो गया। वह ऑफिस में अपनी लापरवाही और बहानों के लिए मशहूर था। पर उस दिन उसका आत्मविश्वास देखते ही बनता था।
रमेश ने ऊंची आवाज़ में कहा, “यह सब मैनेजमेंट की लापरवाही है! सुरक्षा ढीली है, सिस्टम कमजोर है, और अब बेवजह कर्मचारियों पर शक किया जा रहा है।” कमरे में सन्नाटा छा गया। जो खुद अक्सर काम से बचता था, वही सबसे ज्यादा ईमानदारी का भाषण दे रहा था। कुछ लोग दबी हंसी रोक रहे थे, तो कुछ हैरानी से उसे देख रहे थे।
उसी समय आईटी टीम ने बताया कि सीसीटीवी रात दो बजे बंद हुआ था और उसे बंद करने के लिए पासवर्ड डाला गया था। जब पासवर्ड की जांच हुई तो वह रमेश की जन्मतिथि निकली। सबकी नजरें एक साथ उसकी ओर घूम गईं। रमेश का चेहरा सफेद पड़ गया। वह हकलाने लगा और बोला कि यह महज संयोग है।
तभी अकाउंटेंट भागते हुए कमरे में आया और बोला, “सर, पैसे मिल गए! वे गलती से फाइलों के नीचे दब गए थे।” एक पल को सबने राहत की सांस ली। लेकिन माहौल में अजीब सी चुप्पी थी।
बॉस ने हल्की मुस्कान के साथ रमेश की ओर देखा और कहा, “देखा, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।”
कमरे में ठहाका गूंज उठा। रमेश चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठ गया। उस दिन के बाद उसने भाषण देने से पहले दो बार सोचना जरूर सीख लिया।