हमारे ऑफिस के बॉस सचमुच “नाकों चने चबवाने” में विशेषज्ञ थे। उनका सिद्धांत सीधा था—अगर कर्मचारी आराम से बैठे दिख जाएं, तो समझो कंपनी खतरे में है। हर सुबह वे इतनी तेज़ चाल से केबिन में प्रवेश करते कि लगता जैसे किसी परेड का निरीक्षण चल रहा हो। जूते चमकते, टाई कसी रहती और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे दुनिया की सारी डेडलाइन उन्हीं के भरोसे हो।
उनकी नजरें पूरे ऑफिस में ऐसे घूमतीं जैसे दीवारों पर लगे कैमरे भी उनसे दिशा-निर्देश लेते हों। कोई जंभाई ले ले तो तुरंत मीटिंग तय। कोई मोबाइल देख ले तो “इमरजेंसी टास्क” हाथ में। एक दिन मैं हल्का सा छींक गया, तो बोले, “लगता है ऊर्जा ज्यादा है, ये दो अतिरिक्त प्रोजेक्ट भी संभाल लो।” उस दिन से हमने छींकने से पहले भी अनुमति लेना सीख लिया।
उन्हें प्रेरक वाक्यों का बड़ा शौक था। रोज़ नया संवाद सुनाते—“आज मेहनत करो, कल सफलता खुद दरवाज़ा खटखटाएगी।” फर्क बस इतना था कि दरवाज़ा हमेशा हमारा ही खटखटाया जाता था। लंच ब्रेक हमारे लिए किसी मिशन से कम नहीं था। हम घड़ी की सुइयों को ऐसे देखते जैसे परीक्षा का समय खत्म होने वाला हो। एक बार तो उन्होंने कुर्सियां हटवाकर कहा, “खड़े रहोगे तो सक्रिय रहोगे।”
फिर भी, सच्चाई यह है कि हम उन्हें दिल से बुरा नहीं मानते थे। वे खुद सबसे देर तक ऑफिस में रुकते, हमारी छोटी-छोटी गलतियां सुधारते और क्लाइंट के सामने हमेशा टीम का बचाव करते। शुक्रवार को चुपके से समोसे मंगवाकर माहौल हल्का कर देते। साल के अंत में वही सख्त चेहरे वाले बॉस चुपचाप बोनस थमाते हुए मुस्कुरा भी देते।
आज जब हम उन दिनों को याद करते हैं, तो हंसी जरूर आती है। हां, उन्होंने नाकों चने चबवाए, लेकिन उसी बहाने हमें मजबूत, अनुशासित और थोड़ा समझदार भी बना दिया।