शहर के बीचोंबीच एक नया होटल खुला—“रॉयल तड़का पैलेस।” बाहर इतनी चमचमाती लाइटें लगी थीं कि राहगीर धूप में भी चश्मा लगा लें। दरवाज़े पर लाल कालीन, अंदर एसी की ठंडी हवा और दीवारों पर बड़े-बड़े पोस्टर—“शहर का नंबर वन स्वाद।”
मोहल्ले के चार दोस्त रविवार को वहाँ पहुँच गए। वेटर ने इतना झुककर नमस्ते किया कि लगा अभी योगासन कर लेगा। मेन्यू कार्ड इतना भारी था कि उसे पकड़ते ही भूख आधी रह जाए। नाम भी ऐसे कि समझने में ही पाँच मिनट लग जाएँ।
सबने उत्साह में महंगे-महंगे पकवान ऑर्डर कर दिए। पनीर “सम्राट ए खास,” दाल “मुगल-ए-आजम,” और रोटी “राजसी परतदार।” इंतज़ार लंबा था, पर माहौल शानदार। सबने सेल्फी ली और सोशल मीडिया पर लिख दिया—“रॉयल लंच।”
आखिर खाना आया। दिखने में तो सचमुच शाही था। प्लेट पर सजावट इतनी कि आधी जगह पत्तियों और फूलों ने घेर ली थी। दोस्तों ने पहला कौर लिया और एक-दूसरे की तरफ देखा। स्वाद… बस ठीक-ठाक। न नमक खास, न मसाले का जादू।
रवि ने धीरे से कहा, “घर की दाल इससे बेहतर है।” अमित बोला, “नाम बड़ा, स्वाद थोड़ा।” सब हँसी रोकने लगे। वेटर ने पूछा, “कैसा लगा सर?” सबने एक साथ मुस्कुराकर कहा, “बहुत… प्रेजेंटेबल!”
बिल आया तो आँखें और खुल गईं। कीमत देखकर लगा जैसे स्वाद नहीं, सजावट का पैसा लिया गया हो। बाहर निकलते ही चारों ठहाका मारकर हँस पड़े।
तभी सामने एक छोटा-सा ढाबा दिखा। बिना लाइटों के, बिना बड़े पोस्टरों के। उन्होंने वहाँ चाय और समोसा लिया। गरम, ताजा और स्वाद से भरपूर। सबने एक साथ कहा, “वाह!”
रवि मुस्कुराया, “सीख मिल गई—ऊँची दुकान, फीका पकवान।” अमित ने जोड़ा, “लेकिन अनुभव मजेदार था।”
उस दिन दोस्तों ने समझ लिया कि चमक-दमक से ज्यादा जरूरी स्वाद और सच्चाई है। और हाँ, अगली बार फोटो से पहले चखना ज़रूर है!