हमारे मोहल्ले में पंडित कैलाशनाथ जी बड़ी प्रसिद्ध हस्ती थे। प्रसिद्धि का कारण उनका ज्ञान कम और आत्मविश्वास ज़्यादा था। वे हर बात पर ऐसे छाती ठोककर बोलते थे मानो ब्रह्मांड की गोपनीय फाइलें उनके पास ही सुरक्षित हों। उनकी आवाज़ में ऐसा दम था कि साधारण वाक्य भी भविष्यवाणी लगने लगता था।
एक दिन गुप्ता जी ने यूँ ही पूछ लिया, “पंडित जी, बारिश कब होगी?” पंडित जी ने तुरंत आसमान की ओर देखा, आँखें बंद कीं, माथे पर तीन रेखाएँ उभारीं और बोले, “परसों वर्षा निश्चित है!” पूरा मोहल्ला छाते निकालकर तैयार बैठ गया। परसों ऐसी तेज धूप निकली कि लोग आम सुखाने लगे। शिकायत करने पर पंडित जी ने गंभीरता से कहा, “प्रकृति ने अंतिम क्षण में अपना निर्णय बदल दिया।”
कुछ दिनों बाद शर्मा जी की बिल्ली गायब हो गई। पंडित जी को बुलाया गया। उन्होंने हाथ देखकर घोषणा की, “बिल्ली उत्तर दिशा में है।” आधा मोहल्ला उत्तर की ओर दौड़ा। बिल्ली दक्षिण में दूध की दुकान के पास मिली। पंडित जी मुस्कुराए और बोले, “बिल्ली अत्यंत चंचल जीव है, दिशा बदलती रहती है।”
चुनाव के समय तो उनका आत्मविश्वास चरम पर था। उन्होंने छाती ठोककर एक उम्मीदवार की जीत की घोषणा कर दी। परिणाम आया तो वह उम्मीदवार तीसरे स्थान पर था। पंडित जी ने बिना पलक झपकाए कहा, “मेरी आध्यात्मिक दृष्टि में वही विजेता है।”
कहानी का असली मोड़ तब आया जब उनकी खुद की साइकिल चोरी हो गई। मोहल्ले वालों ने घेर लिया—“अब बताइए, चोर कहाँ है?” पंडित जी ने गला साफ किया, छाती ठोकी और बोले, “चोर पास ही है।” तभी पीछे से आवाज आई, “पंडित जी, आपकी साइकिल नाली में गिरी पड़ी है।”
सब हँस पड़े। पंडित जी क्षणभर झेंपे, फिर बोले, “मैंने कहा था न, पास ही है।”
उस दिन के बाद भी उनका आत्मविश्वास जस का तस रहा। बस उन्होंने एक नई पंक्ति जोड़ ली—“फलित ज्योतिष परिस्थितियों पर निर्भर है।” और मोहल्ला आज भी उनकी भविष्यवाणियों का आनंद लेता है।