हमारे गाँव के चौधरी जी अपनी अक्ल पर बड़ा गर्व करते थे। हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान उनके पास तैयार रहता था। लोग कहते थे कि वे ताकत से ज्यादा दिमाग से काम लेते हैं, और इस बात पर वे मूँछों पर ताव देकर मुस्कुरा देते थे।
एक दिन खबर फैली कि उनके खेत में एक बड़ा साँप निकल आया है। मजदूरों ने काम छोड़ दिया और दूर खड़े होकर तमाशा देखने लगे। साँप मेड़ पर कुंडली मारकर बैठा था और कोई भी उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मामला इज्जत का था, इसलिए चौधरी जी को बुलाया गया।
चौधरी जी लाठी लेकर पहुँचे, लेकिन पास जाने के बजाय दूर खड़े होकर हालात का जायजा लेने लगे। साँप सचमुच लंबा और मोटा था। सीधे भिड़ना जोखिम भरा था। तभी उनके दिमाग में एक उपाय आया। उन्होंने एक मजदूर से केरोसिन मंगवाया और दूसरे से सूखी घास इकट्ठी करने को कहा। भीड़ समझ नहीं पा रही थी कि वे क्या करने वाले हैं।
चौधरी जी ने सुरक्षित दूरी बनाकर घास में आग लगवाई। धुआँ उठने लगा और धीरे-धीरे साँप बेचैन होकर सरकने लगा। फुफकारता हुआ वह पास के एक गड्ढे में जा घुसा। बस यही मौका था। चौधरी जी ने तुरंत मजदूरों से गड्ढे में मिट्टी डलवानी शुरू कर दी। ऊपर से पानी भी डाल दिया गया ताकि साँप बाहर न निकल सके।
कुछ देर सन्नाटा रहा। जब कोई हलचल नहीं हुई तो सबने राहत की साँस ली। मजदूरों ने तालियाँ बजाईं और चौधरी जी की तारीफ करने लगे। किसी ने हँसते हुए पूछा, “लाठी तो चली ही नहीं?” चौधरी जी मुस्कुराकर बोले, “अक्ल हो तो लाठी बच जाती है।”
उस दिन गाँव में यही चर्चा थी—“साँप भी मरा, लाठी भी न टूटी।” और चौधरी जी की शान पहले से ज्यादा बढ़ गई।