शहर में शर्मा जी की बेटी की शादी थी। निमंत्रण कार्ड इतना भारी था कि डाकिया दो बार घंटी बजाकर ही थक गया। कार्ड पर बड़े अक्षरों में छपा था—“भव्य स्वागत, शाही इंतज़ाम, यादगार समारोह।” पूरे मोहल्ले ने मान लिया कि इस बार शादी में सचमुच ताजमहल उतर आएगा।
शर्मा जी भी किसी से कम नहीं थे। जो मिलता, उसे बारात की लंबी कहानी सुना देते—बैंड, बाजा, घोड़ी, आतिशबाज़ी, फूलों की बारिश और खास मेहमान। लोग सोच रहे थे कि सड़क जाम होना तय है। बच्चों ने तो गाड़ियों की गिनती करने की तैयारी कर ली थी।
शादी का दिन आया। गेट पर बड़े-बड़े पोस्टर लगे—“रॉयल वेडिंग सेलिब्रेशन।” मोहल्ले वाले समय से पहले सजधज कर पहुँच गए। सबकी नज़रें सड़क पर थीं। तभी दूर से हल्की-सी धूल उड़ती दिखाई दी। सबने समझा, शाही काफिला आ रहा है।
पर धूल के साथ जो आया, वह एक छोटा-सा मिनी बस था। उसमें से उतरे कुल बारह बाराती। घोड़ी का कहीं नामोनिशान नहीं था। दूल्हा खुद ड्राइवर के पास वाली सीट से उतरकर मोबाइल ठीक करता दिखा। बैंड की जगह किसी ने फोन पर गाना चला दिया, और आतिशबाज़ी के नाम पर दो फुलझड़ियाँ जलीं, वो भी आधी बुझी हुई।
मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गई। “इतना बड़ा नाम, और बाराती इतने कम?” शर्मा जी मुस्कुराकर बोले, “क्वालिटी देखिए, क्वांटिटी नहीं।” उधर बाराती पूरे जोश में थे—एक प्लेट में चार-चार गुलाबजामुन, पनीर की सब्ज़ी भर-भरकर, और ऊपर से पूछते, “पैकिंग का इंतज़ाम है क्या?”
भीड़ कम थी, पर खाने का स्वाद अच्छा था। पंडाल थोड़ा खाली लग रहा था, मगर माहौल हल्का-फुल्का और मज़ेदार था। दूल्हे के चाचा ने गर्व से कहा, “हम सादगी में विश्वास रखते हैं।”
अगले दिन मोहल्ले में चर्चा थी—“नाम बड़े, दर्शन छोटे बाराती।” लेकिन सबने माना कि शादी छोटी जरूर थी, पर मज़ा बड़ा आया। तब से लोगों ने सीख ली कि बैनर जितना बड़ा हो, बारात उतनी बड़ी हो, यह ज़रूरी नहीं।