हमारे मोहल्ले में बाबू श्यामसुंदर खुद को बहुत बड़ा रसिक मानते थे। उन्हें लगता था कि खाने-पीने की समझ पूरे शहर में सिर्फ़ उन्हीं के पास है। चाय पीते हुए वे सुड़ककर कहते, “इसमें इलायची कम है,” और समोसा खाते हुए घोषणा करते, “आलू का टेक्सचर सही नहीं।”
एक दिन उन्होंने तय किया कि वे अपने दोस्तों को “खास अदरक वाली हर्बल चाय” पिलाएँगे। बड़े गर्व से बोले, “आज तुम्हें असली स्वाद चखाऊँगा, जो हर किसी के बस की बात नहीं।” मोहल्ले के चार मित्र कुर्सियाँ खींचकर बैठ गए।
रसोई में बाबू ने अदरक इतना कूटा कि आवाज़ बाहर तक आ रही थी। उन्हें विश्वास था कि जितनी ज्यादा अदरक, उतना ज्यादा स्वाद। उधर उनकी पत्नी बार-बार चेतावनी देती रहीं, “इतनी तीखी मत बनाइए।” लेकिन बाबू ने सुनना उचित नहीं समझा।
चाय तैयार हुई। रंग गाढ़ा, खुशबू तेज़। बाबू ने कप थमाते हुए कहा, “सावधान, यह साधारण चाय नहीं है।” सबने पहला घूंट लिया और चेहरों के भाव बदल गए। किसी की आँखों में पानी, किसी की नाक लाल।
मित्र गुप्ता जी ने खाँसते हुए कहा, “वाह… बहुत अलग स्वाद है।” शर्मा जी ने धीरे से फुसफुसाया, “अलग तो है ही।”
बाबू गर्व से बोले, “देखा, समझदार लोग ही असली स्वाद पहचानते हैं।” तभी उनका छोटा बेटा आ गया। उसने जिद की, “मुझे भी चाय चाहिए।” सबने मना किया, लेकिन उसने एक घूंट ले ही लिया। तुरंत मुँह बनाकर बोला, “पापा, ये चाय है या दवाई?”
पूरे कमरे में हँसी फूट पड़ी। पत्नी मुस्कुराकर बोलीं, “ज्यादा अदरक से स्वाद नहीं बढ़ता।”
बाबू थोड़े झेंपे, लेकिन तुरंत बोले, “अरे, तुम्हें क्या पता, बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!”
गुप्ता जी हँसते हुए बोले, “बाबू, यहाँ बंदर कौन है?”
उस दिन से मोहल्ले में जब भी बाबू कोई नई रेसिपी बनाते, लोग पहले ही कह देते—“भाई, अदरक नापकर डालना।”
और बाबू ने भी समझ लिया कि स्वाद दिखावे से नहीं, संतुलन से आता है।