हमारे मोहल्ले में हलवाई रामलाल की दुकान दूर-दूर तक मशहूर थी, खासकर उसकी गरमा-गरम जलेबियों के लिए। सुबह जैसे ही कड़ाही में तेल खौलता और घोल की पतली धार गोल-गोल घूमती, हवा में ऐसी खुशबू फैलती कि लोगों के मुंह में अपने-आप पानी आ जाता।
एक दिन डॉक्टर ने मोहनलाल जी को सख्त हिदायत दी—“मीठा बंद!” कारण था बढ़ी हुई शुगर। मोहनलाल जी ने घर आकर ऐलान कर दिया कि अब वे स्वास्थ्य को प्राथमिकता देंगे। परिवार ने तालियाँ बजाईं, लेकिन मोहल्ले वालों को भरोसा नहीं था।
अगली सुबह जब वे टहलने निकले तो सीधा रास्ता पार्क की ओर था, पर जलेबी की खुशबू ने दिशा बदल दी। कदम अपने-आप रामलाल की दुकान की ओर मुड़ गए। उन्होंने खुद को समझाया, “बस देखूंगा, खाऊंगा नहीं।”
दुकान के सामने खड़े होकर वे जलेबियों को ऐसे निहार रहे थे जैसे कोई पुराना प्रेमी वर्षों बाद मिला हो। रामलाल ने मुस्कुराकर पूछा, “आज कितनी दूँ?” मोहनलाल जी घबरा गए, “न-नहीं, मैं तो बस यूँ ही…”
तभी उनके पीछे से शर्मा जी आ गए। बोले, “अरे, डाइट पर हो न?” यह सुनते ही मोहनलाल जी ने तुरंत जवाब दिया, “हाँ, इसलिए तो जलेबी की गुणवत्ता जांच रहा हूँ, ताकि दूसरों को सावधान कर सकूँ।”
रामलाल ने गरम-गरम जलेबी निकालकर चाशनी में डुबोई। दृश्य इतना मोहक था कि मोहनलाल जी की आत्मा तक पिघल गई। आखिरकार उन्होंने धीमे से कहा, “बस आधा किलो… मतलब, घर वालों के लिए।”
घर पहुँचे तो पत्नी ने पैकेट देखा। पूछा, “ये क्या है?” वे बोले, “पड़ोसी के लिए ले जा रहा था, गलती से यहाँ आ गया।”
इतने में छोटा बेटा बोला, “पापा, रास्ते में ही दो खा चुके हो।”
सारी पोल खुल गई। घर में हँसी गूंज उठी।
उस दिन के बाद मोहनलाल जी ने डाइट का नया नियम बनाया—“जलेबी सप्ताह में एक दिन, वो भी डॉक्टर से छुपाकर।”
और रामलाल की दुकान आज भी सुबह-सुबह लोगों के मुंह में पानी लाने का पवित्र कार्य कर रही है।