रात के ठीक बारह बजे थे जब रोहन की नींद अचानक खुली। कारण कोई डरावना सपना नहीं, बल्कि उसके पेट से आती अजीब सी गुर्राहट थी। उसे तुरंत एहसास हुआ कि पेट में चूहे दौड़ रहे हैं, और वह भी मैराथन की तैयारी के साथ।
शाम को उसने बड़े गर्व से घोषणा की थी कि आज से डाइट शुरू। सिर्फ़ सलाद खाया था और दोस्तों के सामने फिटनेस का भाषण भी दे डाला था। अब वही सलाद पेट में कहीं गुम हो चुका था और उसकी जगह खाली मैदान में चूहे क्रिकेट खेल रहे थे।
रोहन चुपके से रसोई की ओर बढ़ा। घर में सन्नाटा था, लेकिन उसे लग रहा था कि हर कदम की आवाज़ लाउडस्पीकर पर जा रही है। फ्रिज खोला तो ठंडी हवा के साथ उम्मीद की किरण भी निकली। अंदर कल की बची हुई पिज़्ज़ा स्लाइस चमक रही थी।
जैसे ही उसने प्लेट उठाई, पीछे से आवाज़ आई, “क्या कर रहे हो?” वह ऐसे उछला जैसे सचमुच चूहे बाहर निकल आए हों। मम्मी दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ बाँधे हुए।
रोहन ने तुरंत बहाना बनाया, “मैं तो पानी पीने आया था।” मम्मी ने फ्रिज की ओर इशारा किया, “पानी पिज़्ज़ा के डिब्बे में रखा है क्या?”
स्थिति गंभीर थी। रोहन ने आख़िरी कोशिश की, “डाइट में थोड़ा चीट डे चलता है।” मम्मी मुस्कुराईं, “डाइट शुरू हुए छह घंटे भी नहीं हुए।”
आख़िरकार समझौता हुआ। उसे गरम दूध और दो बिस्कुट दिए गए। रोहन ने मन मसोस कर स्वीकार किया, लेकिन पेट के चूहे शायद इससे संतुष्ट नहीं थे।
कमरे में लौटकर उसने सोचा कि अगली बार डाइट की घोषणा दिन में करेगा, रात में नहीं। पिज़्ज़ा की खुशबू अभी भी दिमाग में घूम रही थी।
सुबह दोस्तों के सामने फिर वही जोश था। बोला, “डाइट शानदार चल रही है!”
पेट ने हल्की सी आवाज़ की, जैसे चूहे हँस रहे हों। और रोहन ने तय किया कि फिटनेस ठीक है, लेकिन आधी रात की भूख से बड़ा कोई दुश्मन नहीं।