हमारे मोहल्ले की गली नंबर पाँच में हर रविवार क्रिकेट मैच होना तय था। खिलाड़ी सब अपने-आप को अंतरराष्ट्रीय स्तर का समझते थे, बस मैदान की जगह गली और स्टेडियम की जगह छतों पर बैठे दर्शक थे। इस बार मुकाबला था “यंग स्टार इलेवन” और “अनुभवी टाइगर्स” के बीच। नाम से ही तनाव साफ था।
यंग स्टार इलेवन के कप्तान पप्पू ने मैच से पहले घोषणा कर दी, “आज तो हम इनके दाँत खट्टे कर देंगे।” उधर अनुभवी टाइगर्स के कप्तान, जिन्हें सब चाचा कहकर बुलाते थे, मुस्कुराए और बोले, “बेटा, पहले गेंद देख लो।”
टॉस हुआ, पप्पू की टीम ने पहले बल्लेबाज़ी चुनी। शुरुआत जोश से हुई, लेकिन पहली ही गेंद पर पप्पू बोल्ड। पूरी गली में “ओहो!” की आवाज़ गूँज उठी। पप्पू ने तुरंत बहाना बनाया, “गेंद नीची रही।” अगला बल्लेबाज़ आया, उसने छक्का मारने की कोशिश की और गेंद सीधे शर्मा आंटी की बालकनी में। खेल रुका, गेंद वापस लाने के लिए माफी भी माँगनी पड़ी।
किसी तरह बीस ओवर पूरे हुए और स्कोर बना ठीक-ठाक। अब बारी थी अनुभवी टाइगर्स की। चाचा ने धीरे-धीरे खेलना शुरू किया। कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई दिखावा नहीं। पप्पू की टीम लगातार चिल्लाती रही, “दबाव बना दो!” लेकिन दबाव उल्टा उन्हीं पर आने लगा।
एक-एक रन लेते हुए चाचा ने मैच हाथ में ले लिया। आखिरी ओवर में सिर्फ़ पाँच रन चाहिए थे। पप्पू ने खुद गेंद उठाई, शायद इतिहास बदलने के इरादे से। पहली गेंद चौका। दूसरी पर दो रन। मैच खत्म।
गली में सन्नाटा। चाचा ने मुस्कुराकर कहा, “दाँत खट्टे करने निकले थे न?” पूरी टीम हँसी से फूट पड़ी। पप्पू ने सिर खुजलाते हुए स्वीकार किया, “आज तो हमारे ही दाँत खट्टे हो गए।”
उस दिन के बाद पप्पू ने बड़े-बड़े दावे करना थोड़ा कम कर दिया। और मोहल्ले में यह मैच लंबे समय तक याद रखा गया—एक ऐसा मैच, जिसमें अनुभव ने जोश के सचमुच दाँत खट्टे कर दिए।