हमारे मोहल्ले में रत्ना आंटी अपनी सख़्त छवि के लिए जानी जाती थीं। वे हर किसी को नैतिकता का पाठ पढ़ाती थीं, मानो चरित्र प्रमाणपत्र बाँटना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो। सुबह-सुबह छत पर खड़ी होकर वे पूरे इलाके की गतिविधियों पर नज़र रखतीं और फिर दोपहर तक उनका विश्लेषण भी कर डालतीं।
मजेदार बात यह थी कि जिन बातों पर वे दूसरों को टोकतीं, वही काम वे खुद बड़े आराम से करती थीं। अगर किसी के घर से हँसी की आवाज़ ज़्यादा आ जाए तो कहतीं, “आजकल लोग बहुत उछल रहे हैं।” लेकिन शाम को उनके घर की किटी पार्टी का शोर तीन गलियों तक जाता था।
एक बार उन्होंने सबको समझाया कि फिजूलखर्ची बुरी आदत है। उसी हफ्ते उनके घर नया सोफा, नया पर्दा और नया मोबाइल आ गया। पूछने पर बोलीं, “अरे, यह तो ज़रूरत थी।”
मोहल्ले में चरम स्थिति तब आई जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि अब वे पूरी तरह आध्यात्मिक जीवन जिएँगी। उन्होंने कहा कि वे तीर्थयात्रा पर जा रही हैं और लौटकर सबको संयम और सादगी का मार्ग दिखाएँगी। लोग एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए, लेकिन कुछ बोले नहीं।
उनकी यात्रा से पहले ही उनकी पुरानी कहानियाँ फिर से चर्चा में आने लगीं—किसी का झगड़ा बढ़ाना, किसी की बात आगे बढ़ाना, और कभी-कभी नमक-मिर्च लगाकर खबर फैलाना। सबको मुहावरा याद आ गया—“नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।”
तीर्थ से लौटकर रत्ना आंटी और भी गंभीर हो गईं। अब वे हर वाक्य की शुरुआत करतीं, “जब मैं पवित्र स्थान पर थी…” लेकिन एक दिन गलती से उन्होंने वही पुरानी आदत दोहरा दी और पड़ोसी की छोटी-सी बात को बड़ी खबर बना दिया।
तभी सामने से जवाब आया, “आंटी, हज से लौटकर चूहों की गिनती कम हुई या वही है?”
क्षण भर सन्नाटा छाया, फिर हँसी फूट पड़ी। रत्ना आंटी भी मुस्कुरा दीं। शायद उन्हें भी समझ आ गया कि सुधार भाषण से नहीं, व्यवहार से आता है।