हमारे शहर में एक बड़े प्रसिद्ध नेता जी थे—नाम था बृजमोहन बाबू। लोग उन्हें प्यार से “थाली का बैंगन” कहते थे, क्योंकि वे परिस्थिति के अनुसार दिशा बदलने में माहिर थे। जिस थाली में मौका दिखा, उसी में लुढ़क जाते।
चुनाव का मौसम आते ही उनकी सक्रियता बढ़ जाती। सुबह वे किसानों के बीच बैठकर कहते, “मैं तो जन्मजात किसान हूँ।” दोपहर में व्यापारियों के सम्मेलन में पहुँचकर घोषणा करते, “व्यापार ही देश की रीढ़ है।” शाम को युवाओं के साथ सेल्फी लेते हुए बोलते, “देश का भविष्य सिर्फ़ आप हैं।”
एक बार तो कमाल ही हो गया। सुबह उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वे सख्त नियमों के पक्ष में हैं। दोपहर तक सोशल मीडिया पर माहौल बदला तो बयान आया—“मैं हमेशा जनता की भावनाओं के साथ हूँ।” शाम को टीवी डिबेट में बोले, “मेरी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया।”
उनके समर्थक भी उलझन में रहते। पोस्टर छपवाने से पहले पूछते, “नेता जी, इस बार नारा क्या रहेगा?” नेता जी मुस्कुराकर कहते, “जो जनता चाहे वही।”
एक दिन शहर में पानी की समस्या पर सभा हुई। नेता जी मंच पर पहुँचे और बोले, “हम पानी बचाएँगे।” तभी किसी ने याद दिलाया कि पिछले साल वे नई पानी की फैक्ट्री के खिलाफ थे। नेता जी तुरंत संभल गए, “मैं विरोध में नहीं था, मैं सुधार के पक्ष में था।”
मोहल्ले के बच्चे भी उनका मज़ाक उड़ाने लगे। क्रिकेट खेलते हुए कहते, “जो जीतेगा, हम उसी टीम में।” और फिर हँसते हुए जोड़ते, “पूरे नेता जी!”
चुनाव के नतीजे आए तो वे जीत गए। पत्रकार ने पूछा, “आपकी सफलता का राज़?” नेता जी ने छाती ठोककर कहा, “मैं हमेशा जनता के साथ खड़ा रहता हूँ।”
भीड़ में से किसी ने धीरे से कहा, “खड़े कम, लुढ़कते ज़्यादा हैं।”
नेता जी ने सुनकर भी अनसुना कर दिया। आखिर थाली का बैंगन होने का एक ही फायदा है—जहाँ फायदा दिखा, वहीं टिक जाओ। और हमारे नेता जी इस कला में पारंगत थे।