हमारे घर में मेहमान भगवान माने जाते हैं, लेकिन उस साल आए मिश्रा जी को तो हमने भगवान से भी ऊपर का दर्जा दे दिया। वे दूर के रिश्तेदार थे और बोले थे कि बस दो दिन रुकेंगे। मम्मी ने पूरे उत्साह से तैयारी की, पापा ने छुट्टी ले ली, और हम बच्चों को समझा दिया गया कि “मेहमान के सामने शरारत नहीं।”
पहले दिन सब ठीक रहा। मिश्रा जी ने आते ही कहा, “अरे, इतना कष्ट क्यों किया?” और फिर प्लेट में आठ पकौड़े रख लिए। रात को उन्होंने बताया कि उन्हें सादा खाना पसंद है, इसलिए मम्मी ने अगले दिन से अलग सब्ज़ी बनानी शुरू कर दी।
दूसरे दिन उन्होंने सुझाव दिया कि टीवी की आवाज़ कम रखी जाए, क्योंकि उन्हें न्यूज़ ध्यान से सुननी है। तीसरे दिन बोले कि गद्दा थोड़ा सख्त है। चौथे दिन कहा कि चाय में चीनी आधा चम्मच कम होनी चाहिए। धीरे-धीरे घर का रिमोट, रसोई और सोफा—सब उनके नियंत्रण में आ गए।
हम बच्चों ने महसूस किया कि हमारा कमरा अब उनका विश्राम कक्ष बन चुका है। हमारी पढ़ाई डाइनिंग टेबल पर शिफ्ट हो गई। पापा धीरे से मम्मी से पूछते, “दो दिन कब पूरे होंगे?” मम्मी मुस्कुराकर कहतीं, “बस कल पूछ लेंगे।”
एक हफ्ता बीत गया। मिश्रा जी बड़े आराम से बोले, “यहाँ तो अपना ही घर लगता है।” यह सुनकर पापा का चेहरा ऐसा हो गया जैसे बिजली का बिल देख लिया हो।
आख़िरकार पापा ने साहस जुटाया और विनम्रता से पूछा, “आपकी वापसी की टिकट कब की है?” मिश्रा जी चौंके, “अरे, मैंने तो सोचा आप लोग रोकेंगे।”
अगले ही दिन उनकी टिकट बुक कर दी गई। विदा के समय उन्होंने कहा, “बहुत सेवा की आपने।”
दरवाज़ा बंद होते ही घर में सामूहिक राहत की साँस गूँजी।
मम्मी हँसते हुए बोलीं, “मेहमान भगवान होते हैं, पर भगवान को सिर पर नहीं चढ़ाते।”
उस दिन हमें समझ आया कि अतिथि सत्कार अच्छी बात है, पर सीमा के साथ। वरना मेहमान सिर पर चढ़ते देर नहीं लगाते।