हमारे ऑफिस में एक महान विभूति विराजमान थे — श्री तिवारी जी। पद उनका “सीनियर मैनेजर” था, लेकिन व्यवहार ऐसा मानो समय के स्वयं नियुक्त ब्रांड एंबेसडर हों। घड़ी की टिक-टिक उनके दिल की धड़कन से सिंक्रोनाइज़ थी। कोई कर्मचारी एक मिनट भी लेट हो जाए तो वे ऐसे देखते जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी पर टिकी हो।
तिवारी जी का सिद्धांत साफ था — “काम पहले, सांस बाद में।” वे “गुड मॉर्निंग” का जवाब भी इस अंदाज़ में देते, “मॉर्निंग तभी गुड होगी जब रिपोर्ट टाइम पर होगी।” उनकी मीटिंग्स इतनी अनुशासित होतीं कि कुर्सियाँ भी सीधी कमर करके बैठतीं और पंखा भी धीरे-धीरे घूमता, कहीं तेज़ चलकर अनुशासन न तोड़ दे।
एक दिन मैंने हिम्मत जुटाई और पूछा, “सर, चाय लेंगे?”
उन्होंने चश्मा ठीक किया और बोले, “पहले टारगेट पूरा करो, फिर चाय में शक्कर डालना।”
उस दिन मुझे समझ आया कि हमारे ऑफिस में चाय भी परफॉर्मेंस बेस्ड होती है।
पूरी टीम उनसे इतनी डरती थी कि व्हाट्सऐप पर भी ‘हाहा’ लिखने से पहले सोचती थी कहीं वह भी टाइम वेस्ट में न गिना जाए। एक बार हम सब पाँच मिनट लेट पहुँचे। तिवारी जी ने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराए। वही मुस्कान इतनी खतरनाक थी कि हमें लगा सैलरी स्लिप खुद कांप रही होगी।
लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब एक दिन उनका लैपटॉप अचानक हैंग हो गया। वे बार-बार माउस हिलाते रहे, जैसे उससे कंप्यूटर डरकर चल पड़ेगा। पहली बार हमने उनके चेहरे पर घबराहट देखी। आईटी विभाग आया। लड़के ने कहा, “सर, रीस्टार्ट कर दीजिए।”
तिवारी जी चुप हो गए। दो मिनट बाद सिस्टम चालू हुआ — और उनके चेहरे पर भी नई समझ का सॉफ्टवेयर इंस्टॉल हो गया।
उस दिन के बाद वे थोड़े नरम पड़ गए। अब वे कभी-कभी खुद चाय पूछ लेते हैं। और हम? हम भी समय पर आने लगे — डर से नहीं, आदत से।
मोहल्ले में आज भी लोग कहते हैं —
“अरे, वही तिवारी जी? जो पहले नाकों चने चबवाते थे… और अब रीस्टार्ट में विश्वास रखते हैं!”