हम उस ज़माने के हैं भाई,
जब प्यार में भी मिलती थी धुनाई।
रोते हुए को चुप कराने के लिए,
दोबारा पीटा जाता था जी भर के लिए।
मम्मी कहती, “रोना बंद करो वरना…”,
और “वरना” में छिपा होता था सारा तजुर्बा।
पापा की एक खाँसी ही काफी थी,
पूरी शरारत वहीं माफ़ी थी।
होमवर्क भूलो तो क्लास में मार,
घर आओ तो फिर से सत्कार।
टीवी पर कार्टून देखना सपना था,
रिमोट पर पापा का ही कब्जा अपना था।
गलती से गिलास अगर टूट जाता,
सारा खानदान जज बन जाता।
बाहर खेलते-खेलते देर जो हो जाए,
दरवाज़े पर प्रवचन तैयार मिल जाए।
फिर भी वो बचपन बड़ा निराला था,
मार में भी छिपा प्यार वाला था।
ना टेंशन, ना कोई बहाना था,
बस डर ही हमारा खज़ाना था।
आज के बच्चे समझ नहीं पाएंगे,
उस सख़्ती में भी मज़े थे—ये जान न पाएंगे।
हम उस जमाने के हैं जनाब,
जहाँ थप्पड़ भी थे—पर प्यार भी।