जो साथ है, वो तुम्हारे हैं—जरूरी नहीं,
हर तालियाँ बजाने वाला सहारे हैं—जरूरी नहीं।
कुछ लोग बस भीड़ बढ़ाने आते हैं,
सेल्फी लेकर चुपचाप खिसक जाते हैं।
साथ चलेंगे कहकर हाथ मिलाते हैं,
मोड़ आते ही दिशा बदल जाते हैं।
मीटिंग में सब “हम-हम” चिल्लाते हैं,
काम पड़े तो “तुम-तुम” बतलाते हैं।
मुफ्त की सलाह रोज़ दिलाते हैं,
मदद की बारी में गायब हो जाते हैं।
कंधे से कंधा कहने में तेज़ होते हैं,
वजन उठाने में बहुत कमज़ोर होते हैं।
पर घबराना नहीं, ये खेल पुराना है,
जीवन ने हर किसी को आज़माना है।
जो सच में अपने होते हैं,
वे शोर नहीं, असर में होते हैं।
वे कम बोलते, ज्यादा निभाते हैं,
भीड़ नहीं, भरोसा बन जाते हैं।
इसलिए पहचान सीखो मुस्कान से,
नहीं शब्दों की मीठी उड़ान से।
जो अंत तक संग निभा जाए,
वही अपना कहलाए।
बाकी तो बस राह के यात्री हैं,
तुम्हारी कहानी के अस्थायी पात्र ही हैं।