सही समय पर गलत जगह से निकल जाना,
कभी-कभी भगवान का ही इशारा माना।
जहाँ मुफ्त की सलाहों की बारिश होती है,
वहाँ समझदारी अक्सर फरार होती है।
ऑफिस में जब बॉस का मूड गरम हो जाए,
और फाइलों का पहाड़ सामने आ जाए,
तभी मोबाइल पर नकली कॉल आ जाए,
और इंसान धीरे से बाहर निकल जाए।
शादी में जब रिश्तेदार घेर लें चारों ओर,
और पूछें “कब करोगे?” बार-बार जोर,
तभी अचानक याद आए जरूरी काम,
और जूते पहन भागो श्रीराम!
दोस्तों की बहस जब राजनीति छेड़ दे,
और चाय की टेबल को संसद बना दे,
तभी मुस्कुरा कर पानी पी लेना,
और चुपचाप दरवाज़े से खिसक लेना।
कभी-कभी चुप रहना भी जीत है,
समय पर हट जाना ही प्रीत है।
हर जगह वीर बनना जरूरी नहीं,
कभी-कभी बच जाना भी कमाल सही।
तो याद रखो जीवन का ये ज्ञान,
समय पर खिसकना भी है वरदान।
जहाँ दिमाग कहे “अब बस, निकल लो भाई”,
वहीं समझो ऊपरवाले ने घंटी बजाई।