अंतिम यात्रा में भीड़ उमड़ आती है,
सबकी आँखों में अचानक नमी छा जाती है।
दूर-दूर से रिश्तेदार दौड़े चले आते हैं,
फूलों से ज्यादा फोटो खिंचवाते हैं।
कंधा देने में सब आगे हो जाते हैं,
जीते जी कंधा मांगो तो बहाने बनाते हैं।
वहाँ सब कहते, “बहुत नेक इंसान था”,
जीते जी बोले, “थोड़ा परेशान था!”
माला, भाषण, श्रद्धांजलि की लाइन लगती है,
पर मदद की बारी आए तो घड़ी रुकती है।
वहाँ चाय-समोसे भी गरम मिल जाते हैं,
जीते जी हाल पूछो तो लोग सिमट जाते हैं।
सब कहते, “हम तो परिवार जैसे थे”,
जीते जी महीनों तक नज़र नहीं आते थे।
वहाँ आँसू भी टाइम से टपकाए जाते हैं,
जीते जी मैसेज का रिप्लाई टलवाए जाते हैं।
अंतिम यात्रा में सब साथ निभाते हैं,
जीते जी साथ देने से घबराते हैं।
वहाँ यादों का पिटारा खुल जाता है,
जीते जी दरवाज़ा बंद ही रह जाता है।
इस दुनिया का अजब है ये व्यवहार,
जीते जी कम, बाद में अपार प्यार।
इसलिए भाई, जीते जी मुस्कुरा लेना,
जो पास हैं, उन्हें गले लगा लेना।