बुढ़ापा एक ऐसी अवस्था है निराली,
जहाँ ज्ञान की खुल जाती है तिजोरी खाली।
हर सवाल का उत्तर तैयार रहता है,
पर पूछने वाला कहीं बाहर रहता है।
दादाजी बोले, सुनो मेरी कहानी,
पोते बोले, बाद में दादाजी, अभी है रवानी।
अनुभव की गठरी कंधे पर लटकी,
पर श्रोता सब मोबाइल में अटके।
वो कहें, हमारे ज़माने में ऐसा था,
बच्चे कहें, गूगल पर वैसा था।
चश्मा ढूँढते-ढूँढते सिर पर मिल जाता,
फिर खुद पर ही हँसी का दौर आ जाता।
दाँतों की चर्चा, दवाइयों की बात,
फिर भी दिल से जवान हर रात।
हर विषय पर प्रवचन दे डालें,
चाहे कोई सुने या टालें।
राजनीति से लेकर रसोई तक ज्ञान,
हर मुद्दे पर उनका ही बयान।
कहते हैं, हमसे सीखो अनुभव प्यारे,
बच्चे बोले, पहले WiFi तो सँवारे।
बुढ़ापा सच में कमाल की चीज़,
फ्री सलाह और किस्से अतीत।
उत्तर सारे जेब में रखे होते,
पर प्रश्न पूछने वाले कम ही होते।
फिर भी मुस्कुराकर कहते हैं जनाब,
हम ही हैं चलता-फिरता जवाब।