वक़्त के नाटक में किरदारों को परखना,
जो तुम्हारे दिखते हैं, अक्सर होते नहीं हैं।
चेहरे कई मुखौटे पहनते हैं,
इरादे भीतर कुछ और कहते हैं।
मुस्कानें भी अभिनय होती हैं,
बातें भी योजनाबद्ध होती हैं।
हर तालियों की गूंज सच्ची नहीं,
हर साथ निभाने वाला अपना नहीं।
मंच सजा है रोशनी से,
पर अंधेरा छिपा है हँसी में।
जो पास खड़े दिखाई देते हैं,
वही दूर कहीं खड़े मिलते हैं।
वक़्त ही असली निर्देशक है,
सच का वही परीक्षक है।
पर्दा जब धीरे से गिरता है,
चेहरा असली तभी दिखता है।
ताली और आलोचना बदलती रहती है,
पर नियत हमेशा संभलती रहती है।
इसलिए किरदार नहीं, चरित्र देखो,
शब्द नहीं, व्यवहार देखो।
वक़्त की कसौटी कठोर सही,
पर निर्णय उसका कमजोर नहीं।
नाटक खत्म तो सब छँट जाता है,
सच अंत में ही जगमगाता है।