उन बद्दुआओं से डरो,
जो बोलकर नहीं दी जातीं।
जो आँसुओं में घुलती हैं,
पर होंठों तक नहीं आतीं।
जो दिल के भीतर सुलगती हैं,
पर आवाज़ नहीं बन पातीं।
जिसे दर्द ने जन्म दिया,
और चुप्पी ने पाला।
जहाँ भरोसा टूट जाता है,
वहीं श्राप पनप जाता है।
मासूमियत जब रोती है,
किस्मत भी कहीं सोती है।
जिसका हक़ तुमने छीना,
वो ऊपर तक जाता है।
जिसे तुमने तुच्छ समझा,
वही समय समझाता है।
खामोश आहें हल्की नहीं होतीं,
उनकी चोटें दिखती नहीं होतीं।
वो दुआ बनती नहीं,
पर असर कर जाती हैं।
इसलिए दिल न दुखाओ,
किसी को यूँ न रुलाओ।
क्योंकि खामोश बद्दुआएँ,
वक्त पर हिसाब चुकाती हैं।