अच्छाई की पहचान श्मशान में होती है।
जीते जी इंसान अनदेखा रहता है।
साँसें चलती हैं,
पर कद्र नहीं मिलती।
जिसने साथ निभाया,
उसी को ठुकराया।
जिसने खुद को जलाया,
उसे ही रुलाया।
चिता की आग उठती है,
तब सच्चाई दिखती है।
लोग कहते हैं,
वो बहुत अच्छा था।
दिल से सच्चा था,
सबका अपना था।
जीते जी चुप्पी थी,
अब सबकी स्वीकृति है।
ये कैसी रीति है,
देर से प्रीति है।
जब धड़कन रुक जाती है,
तब तारीफ जग जाती है।
इसलिए अभी सम्मान दो,
जीते जी पहचान दो।
अच्छाई को प्रतीक्षा क्यों,
सम्मान को परीक्षा क्यों।