खुद कमाकर जब घर का खर्च उठाया,
तब जीवन का असली अर्थ समझ आया।
रोटी की कीमत पसीने से जानी,
हर खुशी के पीछे छिपी थी कहानी।
पापा जो चुपचाप शाम को बैठते थे,
अब समझा क्यों वो खामोशी सहते थे।
दिनभर की थकान चेहरे पर होती थी,
पर होठों पर मुस्कान ही सोती थी।
जिम्मेदारियों का बोझ कंधों पर था,
पर परिवार ही उनका असली घर था।
अपनी इच्छाएँ अक्सर टाल देते थे,
हमारे सपनों को पहले डाल देते थे।
जेब भले हल्की हो जाती थी,
पर हिम्मत कभी कम न हो पाती थी।
अब जब खुद कमाकर लौटता हूँ,
थका हुआ सा दरवाज़े पर रुकता हूँ।
समझ आता है वो मौन इशारा,
जिसमें छुपा था प्यार सारा।
पापा की वो अकेली शामें,
दरअसल थीं त्याग की थामें।
अब ठान लिया है मन में ये,
उनके सपनों को भी जियूँगा मैं।
संघर्ष को सम्मान दूँगा हर दिन,
उनकी विरासत बनाऊँगा अपनी पहचान में।