काँटों में रहकर भी फूल सुखी है
महलों में रहकर भी इंसान दुखी है
फूलों ने दर्द को चुपचाप सहना सीख लिया
अपनी खुशबू को हर हाल में कहना सीख लिया
काँटे भी अपनी जगह पर मुस्कुराते हैं
चुपचाप रहकर अपना धर्म निभाते हैं
महलों की चमक में भी मन उदास होता है
अक्सर वहाँ भी कोई सपना अधूरा होता है
सादगी की मिट्टी में सुकून बसता है
सच्चा दिल ही जीवन का सच समझता है
दौलत कभी खुशी की गारंटी नहीं होती
झूठी शोहरत भी दिल की दवा नहीं होती
छोटे घरों में भी प्यार खिल जाता है
रिश्तों का दीपक हर दर्द पी जाता है
काँटों की गोद में भी फूल महकते हैं
सच्चे लोग हर हाल में खुश रहते हैं
महलों में रहने वाला भी तरस जाता है
जब अपना ही साया उससे दूर चला जाता है