कुछ रिश्ते किराए के मकान जैसे होते हैं।
उन्हें कितना भी सजा लो, अपने नहीं होते हैं।
दीवारों पर चाहत की रंगाई कर लो।
फिर भी दिल से कभी जुड़ नहीं होते हैं।
अपना समझकर भी पराया सा लगता है।
हर सपना आधा सा लगता है।
समय की धूल जब जम जाती है।
यादों की खुशबू भी कम हो जाती है।
किराए का घर पल भर का साथ देता है।
पर अपनापन कहाँ साथ रहता है।
जैसे हवा आती है और चली जाती है।
वैसे ही भावना भी टूट जाती है।
रिश्ते भी अगर शर्तों पर हों।
तो प्यार कहाँ फिर दिल में हों।
सच्चाई ही रिश्तों की पहचान है।
विश्वास ही जीवन की शान है।
जो अपना है, वही साथ निभाएगा।
मुश्किल में भी हाथ बढ़ाएगा।
किराए के रिश्ते बदल जाते हैं।
अपने रिश्ते ही रह जाते हैं।