जब तुम उनकी भाषा में बोलने लगते हो।
लोग अपनी ही बात से चौंकने लगते हैं।
सच की चुभन भी हल्की नहीं होती है।
झूठ की नींद अचानक टूट जाती है।
जब जवाब आईना बनकर आता है।
चेहरा अंदर का सच दिखाता है।
अपने शब्द भी भारी लगने लगते हैं।
अपने ही तर्क टकराने लगते हैं।
सत्य की राह आसान कहाँ होती है।
हर आवाज़ सबको रास कहाँ होती है।
अपनी ही परछाईं से डर लगता है।
जब सच की किरणें भीतर जगता है।
लोगों को अपनी तारीफ पसंद होती है।
सच सुनने की हिम्मत कम होती है।
जब शब्द बराबरी से जवाब देते हैं।
अहंकार के पर धीरे टूटते हैं।
सच बोलना भी एक संघर्ष है।
खामोश रहना भी एक विकल्प है।
लेकिन सत्य कभी चुप नहीं रहता।
धीरे धीरे अपना मार्ग चुन लेता।